पता नहीं मुझे ही ऐसा दिख रहा है या सचमुच ऐसा हो रहा है। कल रात से ही हिंदी ब्लॉगों पर गूगल ऐडसेंस के विज्ञापन दिखाई नहीं दे रहे हैं। हो सकता है कि इससे भी पहले से ये न दिख रहे हों। हिंदी चिठ्ठों पर या तो गूगल ऐडसेंस की जगह पर खाली स्थान आ रहा है या भूकंप पीड़ितों की सहायता वाला विज्ञापन दिख रहा है। मैंने जाचने के लिये अपना चिठ्ठा दो-तीन बार पुन: प्रदर्शित करके भी देख लिया। इसके बाद मैंने रवि रतलामी जी, जीतू भाई और भड़ास के चिठ्ठे भी दो-दो बार रिफ्रेश करके देख लिये हैं। सब पर यही समस्या है, खाली स्थान दिख रहा है। लगता है या तो गूगल हिंदी चिठ्ठों से विज्ञापन समेट रहा है या कुछ परीक्षण चल रहा है। आप लोग कृपया अपने यहां से देख कर बतायें।
Saturday, 17 May, 2008
Sunday, 11 May, 2008
हिंदीबात नये रूप में
हिंदीबात चिठ्ठे को नये रुप में (टेम्पलेट) में तैयार किया गया है। इंटरनेटर पर सबसे लोकप्रिय गहरे नीले और सफेद रंग के समायोजन से इसका सजाया गया है। देखते हैं पाठकों को डिजायन कितना पसंद आता है।
प्रकाशित किया Manisha ने 12:52 AM 4 टिप्पणी जुड़ी हुई कड़ियां
श्रेणी: चिठ्ठाकारी, ब्लागिंग
Wednesday, 7 May, 2008
अक्षय तृतीया - एक नया कॉरपोरेट त्यौहार
आजकल दिल्ली के अखबारों में छप रहे विज्ञापनों को देखकर लगता है कि एक और कॉरपोरेट त्यौहार पैदा हो गया है। जी हां पावन अक्षय तृतीया अब कॉरपोरेट जगत का नया त्यौहार है। अक्ष
य तृतीया पर परम्परा के अनुसार लोग सोना खरीदते रहे हैं, क्योंकि आम तौर पर इस दिन शादी - विवाह का आयोजन होता रहा है। इस दिन को भी कंपनियों ने अपने फायदे के लिये भुनाना शुरू कर दिया है। इस बार की अक्षय तृतीया के कई
दिन पहले से ही कंपनियों ने बड़े-बड़े विज्ञापन देना शुरु कर दिया है। कंपनियां ऐसा माहौल बना देंगी कि जो नहीं भी खरीदना चाहते हैं वे भी इसके प्रभावित होकर कुछ तो खरीद ही लेंगे। आने वाले सालों में ये और भी व्यापक रुप लेगा, ऐसा साफ नजर आ रहा है। इससे पहले कॉरपोरेट जगत दीवाली, करवाचौथ और वेलेंटाइन डे को अपना कर चमकीला बना चुका है। कुछ - कुछ शुरुआत रक्षाबन्धन की भी हो चुकी है। कंपनियां अपने फायदे के हिसाब से त्यौहारों को बाजार का हिस्सा बना रही हैं। आप अखबारों मे छपे कुछ विज्ञापनों से अंदाज लगाइये कि बाजार कितनी बड़ी संभावना देख रहा है।
Sunday, 4 May, 2008
यम यस धोनी फ्रोम चेन्नई
आजकल टीवी पर पेप्सी का एक बहुत ही मनोरंजक विज्ञापन महेन्द्र सिंह धोनी को लेकर दिखाया जा रहा है। विज्ञापन काफी मजेदार है। इसमें धोनी झारखण्ड छोड़कर चेन्नई चले गये हैं और बोलने लगे हैं "आई यम यस धोनी फ्रोम चेन्नई"। हमारे घर में सभी को बहुत पसंद आया है। यूट्यूब (YouTube) पर ढूंढने पर यह मिल गया। आप यहां इसको देख सकते हैं। विज्ञापन को देखने से पता चलता है कि धोनी फिल्मों में भी कैरियर बना सकते हैं।
प्रकाशित किया Manisha ने 10:19 PM 4 टिप्पणी जुड़ी हुई कड़ियां
Friday, 2 May, 2008
बात बच्चों की
अपने बच्चों के लालन-पालन के दौरान मुझे कई प्रकार के
सुखद और परेशान करने वाले अनुभवों से गुजरना पड़ा। यों मां बनना एक बहुत ही सुखद और भावनात्मक अनुभव है जिसको शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है, सिर्फ उसको अनुभव किया जा सकता है। बच्चों की परवरिश के दौरान भी मां-बाप को कई प्रकार की खट्टी-मीठी स्थितियों से गुजरना पड़ता है। बच्चा पैदा होते ही सबसे पहले ससुराल और मायके वाले किसी न किसी रुप में बच्चे की शक्ल अपने किसी संबंधी से मिलाने बैठ जाते हैं। बच्चे की शक्ल अपने पक्ष के लोगों से मिलाकर एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध की जाती है। नाक बुआ से मिलती है, आंखें मौसी पर गई हैं, शक्ल चाचा से मिलती है आदि आदि टिप्पणियां सुनाई देती हैं। इसके बाद बच्चे के नाम को लेकर मां-बाप को अनेक सुझाव दिये जाते है।
मां-बाप के लिये वो क्षण बहुत ही सुखद और अत्यंत ही भावनामय हो
ते हैं जब बच्चा पहली बार मुस्कराता है, पहली बार पलटता है, पहली बार जबाव देकर हंसता है, पहली बार घुटनों के बल चलता है, पहली बार चलता है, पहली बार बोलता है पहली बार स्कूल जाता है इत्यादि। जब बच्चा पहली बार पलट कर गिर जाता (पलंग से या कहीं और जगह) तब बहुत ही दुख होता है। अक्सर बच्चे रातों को मां-बाप को जगाते हैं, ढंग से नींद पूरी नहीं हो पाती है। सुबह ऑफिस जाना है लकिन बच्चे ने रो रोकर जान आफत में की होती है। कुछ लक्षण देखिये - शायद आप भी इनसे गुजरे होंगे, नहीं गुजरे हैं तो बच्चे होने पर आप स्वयं अनुभव कर लेंगे।
- जब आप बुरी तरह थके होंगे और आराम करना चाह रहे होंगे, तभी बच्चे रो-रोकर दुखी कर देंगे।
- जब आप खाना खाने के लिये तैयार होंगे उसी समय बच्चों के सूसू-पोटी आयेगी।
- कहीं जाने के लिये तैयार होते समय अगर बच्चों को पहले तैयार कर दिया तो आपके तैयार होने तक उनके कपड़े गंदे हो चुके होंगे।
- घर पर चाहे बच्चे टीवी से परेशान न होते हों, लेकिन अगर सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गये तो आपको रो-रोकर फिल्म देखने नहीं देंगे।
- आप चाहे बच्चों को कितना ही सिखा-पढ़ा लीजिये, लेकिन किसी के यहां जाने पर या किसी के आपके यहां आने पर बच्चे पूरी छूट ले लेंगे और धमा-चौकड़ी मचायेंगे।
- किसी के यहां जाने पर या किसी के आने पर बच्चे खाने-पीने की वस्तुओं पर ऐसे टूट पड़ेगे जैसे कि आप कभी उन्हें ये चीज खाने को कभी नहीं देते हैं। आप कितनी भी आंखे दिखायें पर बच्चे सुनने वाले नहीं हैं। खिसियाते रहिये।
लेकिन फिर भी, बच्चों के साथ एक विशेष प्रकार का आनन्द है। बच्चों के साथ हालांकि मां-बाप की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है, लेकिन बच्चों से जिन्दगी में रोमांच बना रहता है, जिन्दगी की जीवन्तता बनी रहती है। बच्चों को लेकर आप के क्या अनुभव रहे हैं?
Saturday, 26 April, 2008
सड़क हादसों पर किसी का ध्यान नहीं
अभी कल-परसों की ही बात है, जोधपुर के पास एक सड़क हादसे में एक ही परिवार के 23 लोगों की मौत हो गई। इससे पहले बड़ोदा के पास एक दुर्घटना में कई मासूम बच्चों की जान चली गई। आये दिन समाचार पत्रों में सड़क दुर्घटना होने एवं उसके कारण होने वाली मौतों खबर छपती रहती है। लगता है हम सब इसको एक आम समाचार मान कर अनदेखा कर देते हैं। न तो सरकार में इसको लेकर कोई हलचल दिखाई देती है, न ही जनता में इसके प्रति कोई आक्रोश या जागरुकता है।
मेरे ख्याल से ये एक गंभीर मामला है। सड़क दुर्घटनायें भारत के हर कोने में घट रही हैं। आम जनता का तो कहना ही क्या, कई नामी गिरामी लोग, अधिकारी और नेता भी सड़क हादसों का शिकार बन चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, राजेश पायलेट, साहिव सिंह वर्मा आदि अनेक नेता सड़क हादसों में मारे जा चुके हैं, लेकिन लगता नहीं कि फिर भी इसको सुधारने के बारे में सोचा जा रहा हों। भारत में पूरी दुनिया के केवल एक प्रतिशत वाहन हैं लेकिन सड़क दुर्घटनाओं का प्रतिशत छै है। इसी सें अंदाज लग सकता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। अगर वाहन और बढ़े तो क्या होगा? दुर्घटनाओं की एक वजह तो यातायात कानून का पूरी तरह पालन न होना है, दुसरा ड्राइविंग लाइसेंस कहीं से भी कैसे भी बन जाता है। यहां पर लोगो को न तो अपनी जान की चिंता है और न ही दूसरों की। सड़क हादसों के बारे में कोई गंभीर नहीं है। ऐसे में बस खबरें छपती रहती हैं और सब ऐसे ही चलता रहता है।
Friday, 25 April, 2008
हिंदी फिल्म गानों का बदलता स्वरुप
अगर आपने गौर किया हो तो आपने देखा होगा कि इधर एक-दो वर्षों से हिंदी फिल्मी गानों के शब्दों मे व्यापक परिवर्तन आ गया है। हिंदी फिल्म गाने अब भांगड़ा-रैप या इंडी-रैप की तर्ज पर अंग्रेजी मिश्रित हो गये हैं। पिछले एक वर्ष के लगभग सभी हिट गाने अंग्रेजी के शब्दों से भरपूर रहे हैं। धूम, ओम शांति ओम, क्रेजी-4, रेस आदि अधिकांश फिल्मों के गानों में अंग्रेजी ज्यादा और हिंदी का कम प्रयोग हुआ है। पहले हिंदी फिल्म गाने अधिकांशत: उर्दू व फारसी के शब्दों का प्रयोग करते थे। फिर नये दौर में हिंदी शब्दों का प्रचलन भी बढ़ा। अब हिंदी फिल्म गाने अंग्रेजीमय हो गये हैं। इसका क्या कारण है? शायद हिंदी फिल्मों का बाहर के देशों में पसंद किया जाना और इसके कारण नये मार्केट का उदय होना या फिर आजकल जैसा अंग्रेजी का जोर बढ़ रहा है, उसी बहाव में शायद निर्माता - निर्देशक और गीतकार बह रहे है। फिलहाल इस तरह के गाने चल तो रहे हैं, कुछ तो सुपरहिट भी हुये हैं, लेकिन इससे हिंदी फिल्मों की अपनी जो एक विशेष पहचान थी, उसके नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। क्या पता ग्लोबलाइजेशन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार को देखते हुये बॉलीवुड के निर्माता - निर्देशक अंग्रेजी में ही फिल्में बनाने लगें।
एक अच्छी खबर भी है, हाल के दिनों में तेलुगु के हिट गानों में हिंदी शब्दों का अच्छा खासा उपयोग किया गया है।








