Wednesday, 28 May, 2008

इसरो का चन्द्रयान-1 कार्यक्रम

chandrayan-1

हाल ही में पीएसएलवी-सी9 (Polar Satellite Launch Vehicle  : PSLV-C9) राकेट के जरिये एक साथ 10 उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करने से उत्साहित भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) (Indian space Research Organisation - ISRO)  के वैज्ञानिकों ने इसी वर्ष की तीसरी तिमाही मे चन्द्रमा पर  'चन्द्रयान-1'  नाम के  एक अंतरिक्ष यान को भेजने की  योजना तैयार की है। इस यान में कोई भी यात्री चन्द्रमा की यात्रा पर नहीं जायेगा। यानी  अभी ये यान मानवरहित होगा। chanraAbhiyan इस अभियान का उद्देश्य चन्द्रमा से विभिन्न प्रकार के खनिज पदार्थ, रासायनिक तत्व लाकर उनका अध्ययन करना तथा पूरे चन्द्रमा की सतह का  हाई-रिजोल्यूशन वाला तीन आयामी मानचित्रीकरण करना है। पीएसएलवी राकेट के जरिये इस चन्द्रयान पहले पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया जायेगा और इसके बाद इस चन्द्रयान का खुद का प्रक्षेपण सिस्टम इसे चन्द्रमा के पास ले जायेगा। इस चन्द्रयान का जीवन काल 2 साल का है।  ये यान चन्द्रमा की सतह से 100 किलोमीटर ऊपर उसकी कक्षा में रहेगा।

इस अभियान से सफल होने से निसंदेह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम की न केवल ख्याति बढ़ेगी बल्कि भारत का नाम भी रोशन होगा। हमें दुआ करनी चाहिये कि ये चन्द्रयान सफलतापूर्वक अपना काम करे और भारत के वैज्ञानिकों की उपलब्धियों में एक और उपलब्धि जुड़े।

इस अभियान की सभी जानकारी इसरो की वेबसाइट पर यहां उपलब्ध है। (सभी चित्र इसरो की साइट से)

Tuesday, 27 May, 2008

वो कुछ पुरानी बातों की यादें

हाल ही में रवि रतलामी जी ने बताया कि "पुराने दिनों को लोगबाग याद करते हैं तो क्या बुरा करते हैं. हर गुजरा हुआ पुराना दिन मीठी याद लिए हुए होता है और वो शर्तिया वर्तमान और आने वाले दिनों से ज्यादा अच्छा होता है. " हांलांकि ये नहीं है कि हर पुरानी बात अच्छी ही हो, नई सोच, नई बात पुरानी बातों को ही आगे बढ़ाकर नये रुप में सामने लाती हैं। नयापन तो जीवंतता की निशानी है और परिवर्तन संसार का नियम है। लेकिन पुरानी बातें, चाहे अच्छी या बुरी, यादें छोड़ जाती हैं। हमारे भी पुराने समय को लेकर कुछ ऐसी ही यादें हैं जो अक्सर जहन में आ जाती हैं।

  • रेडियो - घर पर एक बड़ा सा रेडियो था जो कि घर में लगातार चला करता था, पसंद के प्रोग्राम सुनने के लिये ऐसे ही लड़ाई होती थी, जैसे आज टीवी के रिमोट के लिये।
  • विविध भीरती, रेडियो सीलोन और आकाशवाणी - रेडियो सीलोन पर अमीन सयानी जी की बिनाका गीतमाला तो शायद ही कोइ भूला हो। सब बड़े लोग इसे सुना करते थे, हम लोग भी सुन लेते थे। लेकिन हम लोग विविध भारती को ज्यादा सुनते थे जिमसें सबसे ज्यादा याद एक उस कार्यक्रम की (नाम याद नहीं आ रहा)  है जिसमें मूर्खाधिपति महराज मंदबुद्धि सिंह आते थे और न्याय करते थे। इसी प्रकार पापा आकाशवाणी के समाचार सुनते थे जिसे देवकीनंदन पांडेय सुनाते थे।
  • लम्ब्रेटा स्कूटर - हमारे घर पर ये स्कूटर था।
  • आवाज वाली येजडी मोटरसाइकिल - हमारे पड़ोस वाले अंकल के पास येजडी मोटरसाइकिल थी, जो बहुत आवाज करती थी। सुबह-सुबह हमारे स्कूल जाने के समय वो उसको आधे घंटे तक स्टार्ट करते रहते थे।
  • ढिशुम-ढिशुम - उस समय जो फिल्में होती थी उनमें लड़ाई के समय ढिशुम-ढिशुम और भिशुम-भिशुम की आवाजें होती थीं।
  • फिल्मों का कॉमेडियन - पुरानी फिल्मों में हास्य कलाकारों के लिये अलग से कथानक चलता था। महमूद, जानीवाकर, मुकरी, धूमल, सुंदर, मोहनचोटी इत्यादी ने अनेक यादगार रोल निभाये हैं, जो आज भी कभी न कभी याद आ जाते है।
  • घर पर टीवी आने के बाद फिल्म और चित्रहार का हमेशा इंतजार रहता था।
  • दूरदर्शन के सीरियल - दूरदर्शन के कुछ सीरियल हमेशा याद आते हैं और ऐसा लगता कि काश कोई ऐसा टीवी चैनल होता जो उनको अभी भी दिखाया करता। मालगुड़ी डेज, बाबजी का बाइस्कोप, भारत एक खोज, कथा सागर, हम लोग, ये जो है जिन्दगी, आदि को कौन भुला सकता है। वो टीवी सीरियलों का सुनहरा दौर था।
  • पत्रिकायें - धर्मयुग /  साप्ताहिक हिंदुस्तान इत्यादि।

ऐसे ही समय समय पर कुछ भी पुरानी बाते याद आती ही रहती हैं।

Tuesday, 20 May, 2008

इस तरह हमने आतंकवाद का विरोध किया

जयपुर में हुये आतंकवादी हमले को आज एक हफ्ता होने को आया है, लगभग 70 लोगों की जाने इस कायरतापूर्ण हमले में चली गईं। पिछले एक हफ्ते के अखबारों और टीवी की खबरों के हिसाब से जयपुर के आतंकवादी हमले के बाद हमारी ये प्रतिक्रियायें रहीं :

  • टीवी चैनल वालों को पता नहीं कहां से पता लग गया कि हमले में हूजी का हाथ है, और इस घटना में खुफिया विभाग की घोर लापरवाही है [विश्लेशण तो हो जाने दो]
  • सभी ने इस घटना की निंदा की, लेकिन आतंकवादियों को इसका सबक सिखाने की बात किसी ने नहीं कही।
  • राज्य सरकार ने केन्द्र पर इसकी जिम्मेदारी डाली और केन्द्र ने राज्य सरकार पर [जनता क्या करे?]
  • बीजेपी ने कांग्रेस पर आरोप लगाये और कांग्रेस ने बीजेपी पर [दोनों का रिकार्ड खराब है]
  • लोगों ने अपने-अपने शहरों में आतंकवाद का पुतला फूंका [अपनी फोटो और नाम अखबार में छपाने के लिये ऐसा किया गया, आतंक से लड़ने का के लिये लोगो को सावधान रहने को किसी ने नहीं कहा]
  • टीवी वाले दो दिन बाद ही वापस आईपीएल और फिर नोयडा कांड पर आ गये।

तो इस प्रकार सरकार, टीवी, जनता सब पुरानी तरह से बातें करके वापस पुराने ढर्रे पर गये। काश सब मिलकर संकल्प लें कि आतंकवाद का मुकाबला करेंगे और इस तरह के बम विस्फोट करने वालों को छोड़ेंगे नहीं।

Monday, 19 May, 2008

नोयडा कांड जयपुर आतंकवादी घटना से बड़ा

जयपुर में पिछले मंगलवार को हुये आतंकवादी हमले को अभी एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ लेकिन पिछले दो दिनों के हिंदी समाचार चैनलों को को देखने के बाद ऐसा लगता है कि भारत के हिंदी टीवी समाचार चैनल वालों के लिये जयपुर का आतंकवादी हमला नोयडा के एक दोहरे हत्याकांड के मुकाबले कुछ भी नहीं है। पिछले दो दिनों से नोयडा में हुये हत्याकांड को इस तरह से दिखाया जा रहा है जैसे कि ये देश की सबसे बड़ी खबर हो। यहां तक की सभी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज भी इसी से भरी हुई है। माना कि ये भी एक घटना है और इसका भी विवरण आना चाहिये लेकिन ये इतनी भी महत्वपूर्ण नहीं है कि आप इसे मुख्य समाचार बनाकर दिनभर दिखाते रहे। जरा सोचिये भागलपुर, हैदराबाद, जम्मू, देहरादून के लोगों के लिये इस समाचार में क्या रुचि हो सकती है? भारत में तमाम जगह ऐसे और इससे भी भयंकर हत्याकांड रोजाना हो रहे हैं, उनको तो ये टीवी चैनल वाले नहीं दिखाते?  क्या केवल दिल्ली और उसके आसपास की घटनायें ही राष्ट्रीय समाचार बनने लायक है?

लेकिन आतंकवाद की घटना, देश के सभी जगह के लोगों के लिये महत्वपूर्ण है। इसका व्यापक विश्लेषण करके दिखाने की जरुरत है। यहां तो हिंदी चैनल वाले अभी से जयपुर की घटना को भुला रहे हैं। हैदराबाद की मक्का मस्जिद में हुये आतंकवादी हमले को मई में एक साल पूरा हो गया, लेकिन किसी भी हिंदी चैनल पर कोई भी कार्यक्रम इसके ऊपर नहीं दिखाया गया। किसी भी आतंकवादी घटना के विश्लेषण और पुलिस और सरकार की कार्यवाही एवं जांच कहां तक पहुंची, इसके ऊपर लगातार समाचार दिखाने चाहिये, तभी तो देश की जनता का विश्वास बना रहेगा। जयपुर की घटना में मारे गये लोगों के परिवारों के बरे में बताया जाना चाहिये। ये आतंकवाद की मुद्दा देश के लिये महत्वपूर्ण है, इसे इतनी जल्दी नजरअंदाज न करें।

Saturday, 17 May, 2008

हिंदी चिठ्ठों से ऐडसेंस गायब

पता नहीं मुझे ही ऐसा दिख रहा है या सचमुच ऐसा हो रहा है। कल रात से ही हिंदी ब्लॉगों पर गूगल ऐडसेंस के विज्ञापन दिखाई नहीं दे रहे हैं। हो सकता है कि इससे भी पहले से ये न दिख रहे हों। हिंदी चिठ्ठों पर या तो गूगल ऐडसेंस की जगह पर खाली स्थान आ रहा है या भूकंप पीड़ितों की सहायता वाला विज्ञापन  दिख रहा है। मैंने जाचने के लिये अपना चिठ्ठा दो-तीन बार पुन: प्रदर्शित करके भी देख लिया। इसके बाद मैंने रवि रतलामी जी, जीतू भाई और भड़ास के चिठ्ठे भी दो-दो बार रिफ्रेश करके देख लिये हैं। सब पर यही समस्या है, खाली स्थान दिख रहा है। लगता है या तो गूगल हिंदी चिठ्ठों से विज्ञापन  समेट रहा है या कुछ परीक्षण चल रहा है। आप लोग कृपया अपने यहां से देख कर बतायें।

Sunday, 11 May, 2008

हिंदीबात नये रूप में

हिंदीबात चिठ्ठे को नये रुप में (टेम्पलेट) में तैयार किया गया है। इंटरनेटर पर सबसे लोकप्रिय गहरे नीले और सफेद रंग के समायोजन से इसका सजाया गया है। देखते हैं पाठकों को डिजायन कितना पसंद आता है।

Wednesday, 7 May, 2008

अक्षय तृतीया - एक नया कॉरपोरेट त्यौहार

AkshayTritiya1

आजकल दिल्ली के अखबारों में छप रहे विज्ञापनों को देखकर लगता है कि एक और कॉरपोरेट त्यौहार पैदा हो गया है। जी हां पावन अक्षय तृतीया अब कॉरपोरेट जगत का नया त्यौहार है। अक्षAkshayTritiya2य तृतीया पर परम्परा के अनुसार लोग सोना खरीदते रहे हैं, क्योंकि आम तौर पर इस दिन शादी - विवाह का आयोजन होता रहा है। इस दिन को भी कंपनियों ने अपने फायदे के लिये भुनाना शुरू कर दिया है। इस बार की अक्षय तृतीया के कई AkshayTritiya3दिन पहले से ही कंपनियों ने बड़े-बड़े विज्ञापन देना शुरु कर दिया है। कंपनियां ऐसा माहौल बना देंगी कि जो नहीं भी खरीदना चाहते हैं वे भी इसके प्रभावित होकर कुछ तो खरीद ही लेंगे। आने वाले सालों में ये और भी व्यापक रुप लेगा, ऐसा साफ नजर आ रहा है। इससे पहले कॉरपोरेट जगत दीवाली, करवाचौथ और वेलेंटाइन डे को अपना कर चमकीला बना चुका है। कुछ - कुछ शुरुआत रक्षाबन्धन की भी हो चुकी है। कंपनियां अपने फायदे के हिसाब से त्यौहारों को बाजार का हिस्सा बना रही हैं। आप अखबारों मे छपे कुछ विज्ञापनों से अंदाज लगाइये कि बाजार कितनी बड़ी संभावना देख रहा है।

Sunday, 4 May, 2008

यम यस धोनी फ्रोम चेन्नई

आजकल टीवी पर पेप्सी का एक बहुत ही मनोरंजक विज्ञापन महेन्द्र सिंह धोनी को लेकर दिखाया जा रहा है। विज्ञापन काफी मजेदार है। इसमें धोनी झारखण्ड छोड़कर चेन्नई चले गये हैं और बोलने लगे हैं "आई यम यस धोनी फ्रोम चेन्नई"। हमारे घर में सभी को बहुत पसंद आया है। यूट्यूब (YouTube) पर ढूंढने पर यह मिल गया। आप यहां इसको देख सकते हैं। विज्ञापन को देखने से पता चलता है कि धोनी फिल्मों में भी कैरियर बना सकते हैं।

 

Friday, 2 May, 2008

बात बच्चों की

अपने बच्चों के लालन-पालन के दौरान मुझे कई प्रकार के सुखद और परेशान करने वाले अनुभवों से गुजरना पड़ा। यों मां बनना एक बहुत ही सुखद और भावनात्मक अनुभव है जिसको शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है, सिर्फ उसको अनुभव किया जा सकता है। बच्चों की परवरिश के दौरान भी मां-बाप को कई प्रकार की खट्टी-मीठी स्थितियों से गुजरना पड़ता है। बच्चा पैदा होते ही सबसे पहले ससुराल और मायके वाले किसी न किसी रुप में बच्चे की शक्ल अपने किसी संबंधी से मिलाने बैठ जाते हैं। बच्चे की शक्ल अपने पक्ष के लोगों से मिलाकर एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध की जाती है। नाक बुआ से मिलती है, आंखें मौसी पर गई हैं, शक्ल चाचा से मिलती है आदि आदि टिप्पणियां सुनाई देती हैं। इसके बाद बच्चे के नाम को लेकर मां-बाप को अनेक सुझाव दिये जाते है।

मां-बाप के लिये वो क्षण बहुत ही सुखद और अत्यंत ही भावनामय होते हैं जब बच्चा पहली बार मुस्कराता है, पहली बार पलटता है, पहली बार जबाव देकर हंसता है, पहली बार घुटनों के बल चलता है, पहली बार चलता है, पहली बार बोलता है पहली बार स्कूल जाता है इत्यादि। जब बच्चा पहली बार पलट कर गिर जाता (पलंग से या कहीं और जगह) तब बहुत ही दुख होता है। अक्सर बच्चे रातों को मां-बाप को जगाते हैं, ढंग से नींद पूरी नहीं हो पाती है। सुबह ऑफिस जाना है लकिन बच्चे ने रो रोकर जान आफत में की होती है। कुछ लक्षण देखिये - शायद आप भी इनसे गुजरे होंगे, नहीं गुजरे हैं तो बच्चे होने पर आप स्वयं अनुभव कर लेंगे।

  1. जब आप बुरी तरह थके होंगे और आराम करना चाह रहे होंगे, तभी बच्चे रो-रोकर दुखी कर देंगे।
  2. जब आप खाना खाने के लिये तैयार होंगे उसी समय बच्चों के सूसू-पोटी आयेगी।
  3. कहीं जाने के लिये तैयार होते समय अगर बच्चों को पहले तैयार कर दिया तो आपके तैयार होने तक उनके कपड़े गंदे हो चुके होंगे।
  4. घर पर चाहे बच्चे टीवी से परेशान न होते हों, लेकिन अगर सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गये तो आपको रो-रोकर फिल्म देखने नहीं देंगे।
  5. आप चाहे बच्चों को कितना ही सिखा-पढ़ा लीजिये, लेकिन किसी के यहां जाने पर या किसी के आपके यहां आने पर बच्चे पूरी छूट ले लेंगे और धमा-चौकड़ी मचायेंगे।
  6. किसी के यहां जाने पर या किसी के आने पर बच्चे खाने-पीने की वस्तुओं पर ऐसे टूट पड़ेगे जैसे कि आप कभी उन्हें ये चीज खाने को कभी नहीं देते हैं। आप कितनी भी आंखे दिखायें पर बच्चे सुनने वाले नहीं हैं। खिसियाते रहिये।

लेकिन फिर भी, बच्चों के साथ एक विशेष प्रकार का आनन्द है। बच्चों के साथ हालांकि मां-बाप की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है, लेकिन बच्चों से जिन्दगी में रोमांच बना रहता है, जिन्दगी की जीवन्तता बनी रहती है। बच्चों को लेकर आप के क्या अनुभव रहे हैं?

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