Saturday, 26 April, 2008

सड़क हादसों पर किसी का ध्यान नहीं

अभी कल-परसों की ही बात है, जोधपुर के पास एक सड़क हादसे में एक ही परिवार के  23 लोगों की मौत हो गई। इससे पहले बड़ोदा के पास एक दुर्घटना में कई मासूम बच्चों की जान चली गई। आये दिन समाचार पत्रों में सड़क दुर्घटना होने एवं उसके कारण होने वाली मौतों खबर छपती रहती है। लगता है हम सब इसको एक आम समाचार मान कर अनदेखा कर देते हैं। न तो सरकार में इसको लेकर कोई हलचल दिखाई देती है, न ही जनता में इसके प्रति कोई आक्रोश या जागरुकता है।

मेरे ख्याल से ये एक गंभीर मामला है। सड़क दुर्घटनायें भारत के हर कोने में घट रही हैं। आम जनता का तो कहना ही क्या, कई नामी गिरामी लोग, अधिकारी और नेता भी सड़क हादसों का शिकार बन चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, राजेश पायलेट, साहिव सिंह वर्मा आदि अनेक नेता सड़क हादसों में मारे जा चुके हैं, लेकिन लगता नहीं कि फिर भी इसको सुधारने के बारे में सोचा जा रहा हों। भारत में पूरी दुनिया के केवल एक प्रतिशत वाहन हैं लेकिन सड़क दुर्घटनाओं का प्रतिशत छै है। इसी सें अंदाज लग सकता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। अगर वाहन और बढ़े तो क्या होगा?  दुर्घटनाओं की एक वजह तो यातायात कानून का पूरी तरह पालन न होना है, दुसरा ड्राइविंग लाइसेंस कहीं से भी कैसे भी बन जाता है। यहां पर लोगो को न तो अपनी जान की चिंता है और न ही दूसरों की। सड़क हादसों के बारे में कोई गंभीर नहीं है। ऐसे में बस खबरें छपती रहती हैं और सब ऐसे ही चलता रहता है।

Friday, 25 April, 2008

हिंदी फिल्म गानों का बदलता स्वरुप

अगर आपने गौर किया हो तो आपने देखा होगा कि इधर एक-दो वर्षों से हिंदी फिल्मी गानों के शब्दों मे व्यापक परिवर्तन आ गया है। हिंदी फिल्म गाने अब भांगड़ा-रैप या इंडी-रैप की तर्ज पर अंग्रेजी मिश्रित हो गये हैं। पिछले एक वर्ष के लगभग सभी हिट गाने अंग्रेजी के शब्दों से भरपूर रहे हैं। धूम, ओम शांति ओम, क्रेजी-4, रेस आदि अधिकांश फिल्मों के गानों में अंग्रेजी ज्यादा और हिंदी का कम प्रयोग हुआ है। पहले हिंदी फिल्म गाने अधिकांशत:  उर्दू व फारसी के शब्दों का प्रयोग करते थे। फिर नये दौर में हिंदी शब्दों का प्रचलन भी बढ़ा। अब हिंदी फिल्म गाने अंग्रेजीमय हो गये हैं। इसका क्या कारण है?  शायद हिंदी फिल्मों का बाहर के देशों में पसंद किया जाना और इसके कारण नये मार्केट का उदय होना या फिर आजकल जैसा अंग्रेजी का जोर बढ़ रहा है, उसी बहाव में शायद निर्माता - निर्देशक और गीतकार बह रहे है। फिलहाल इस तरह के गाने चल तो रहे हैं, कुछ तो सुपरहिट भी हुये हैं, लेकिन इससे हिंदी फिल्मों की अपनी जो एक विशेष पहचान थी, उसके नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। क्या पता ग्लोबलाइजेशन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार को देखते हुये बॉलीवुड के निर्माता - निर्देशक अंग्रेजी में ही फिल्में बनाने लगें।

एक अच्छी खबर भी है, हाल के दिनों में तेलुगु के हिट गानों में हिंदी शब्दों का अच्छा खासा उपयोग किया गया है।

Tuesday, 22 April, 2008

अपनो द्वारा ही मारे जाते लोग

ये कोई अच्छी बात नहीं है लेकिन बहुत गंभीर और सोचने वाली बात है। पिछले महीनों से समाचारों मे देख रही हूं कि लोग घरों में अपनों द्वारा ही या तो मारे जा रहे हैं या मरवाये जा रहे हैं।

अभी हाल के दिनों में ही दिल्ली के कालकाजी इलाके में एक व्यक्ति द्वारा अपनी बहन और बहनोई को संपत्ति के लिये मरवाने की साजिश की गई जिसमें बहनोई की दिन दहाड़े हत्या की गई, मेरठ में सगे भाई द्वारा भाई की हत्या करवाई गई, गाजियाबाद में युवक द्वारा अपने मां-बाप और बहन को घायल किया गया, दिल्ली पालम राजनगर में युवक ने अपने को गोद लेने वाले मां-बाप और पत्नी की हत्या कर दी। अमरोहा में तो घर की लड़की ने घर के सात लोगो का कत्ल अपने प्रेमा के साथ मिलकर कर दिया।

ये तो सिर्फ कुछ घटनाओं का जिक्र है, वर्ना न जाने कितनी ऐसी बरदाते रोजाना समाचार पत्रों में छपती हैं। आखिर ये सब क्या हो रहा है?  हमारे समाज में ऐसा क्या हो गया है कि लोग इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। समाज को इस पर विचार करने की जरुरत है। कहीं न कहीं कई बुराईयां घरों को तबाह कर रही हैं। समाचार माघ्यमों और समाज में इस बारे में अभी तो कुछ विचार-विमर्श होता हुआ नहीं दिख रहा है। अमेरिका में किसी छात्र द्वारा स्कूल में अपने साथियों की हत्या हो जाने पर यहां के समाचार पत्रों में तमाम संपादकीय लिख कर अमेरिकी समाज को खूब सलाहें दी जाती हैं, लेकिन अपने यहां इतना सब कुछ हो रहा है उस के ऊपर कोई चर्चा नहीं हो रही है।

या तो लोगों को कानून का न डर रह गया है न उसकी परवाह या फिर लोग इतने व्यक्तिवादी हो गये हैं कि दूसरों को मिटाने पर तुले हैं। गंभीरता से हमें इस विषय पर चिंतन करना होगा वर्ना स्थिति बहुत गंभीर हो जायेगी।

Tuesday, 15 April, 2008

स्टैटकाउंटर अब हिंदी मे भी

दुनिया भर के चिठ्ठाकारो द्वारा पेज देखने की संख्या को बताने वाला स्टैटकाउंटर (StatCounter) अब हिंदी मे भी अपना विवरण दिखाने लगा है। अभी यह मेरे खाते में लेबल को हिंदी मे दिखा रहा है। नीचे का चित्र देखिये, गोले में हिंदी में लेबल साफ दिख रहा है। अभी तक स्टैटकाउंटर में ये ही पता नहीं लगता था कि कौन सा पेज देखा गया है, लेकिन अब पता लग जाया करेगा। लगता है स्टैटकाउंटर ने यूनीकोड में काम शुरु कर दिया है।

StatCounterinHindi

Monday, 14 April, 2008

अजीब अजीब से शोध

कई दिनों से समाचार पत्रों में छपने वाले रिसर्च (शोध) के परिणामों को छपता देख रही हूँ। अजीब अजीब सी बातों पर इस तरह के शोध विदेशी संस्थानों द्वारा किये जाते हैं, जिन्हें भारत के अखबार भी छाप देते हैं। पिछले हफ्ते के दौरान किस प्रकार की कई शोध रिपोर्टें छपी हैं, जरा उनको देखिये :

  • को-एजुकेशन स्कूल (सहशिक्षा विद्यालय) अच्छे होते हैं क्योंकि वहां लडकियां लड़कों को गलत हरकतों को करने के में रुकावट बनती हैं और उन पर लगाम लगी रहती है। साथ ही साथ पढ़ाई में अच्छा करने के लिये उत्प्रेरक का काम भी लडकियां करती हैं।  - क्या ख्याल है?
  • आजकल इतनी तरह के गैजेट्स हो गये हैं, कि मध्यम वर्ग के लोगों का इतना समय बचता है कि अब 24 घंटे में इतना काम किया जा सकता है जितना पहले 31 घंटे में होता था -  कितना काम कराओगे - अपनी भी तो इंसान की जिन्दगी है कि नहीं, उसके लिये भी समय छोढ़ो।
  • आपकी उम्र की गणना आपकी हड्डियों में लिखी रहती है। अब आपकी हड्डियों सा जाना जा सकता है कि आप कितनी तेजी से बड़े होते हैं।
  •  आकर्षक महिला और साधारण रंग रुप वाले पुरूषों की जोड़ी सफल रहता है। - हो सकता है और नहीं भी, सफल वैबाहिक जीवन के लिये कई कारक होते है।
  • पुरुषों के चेहरे से पता चल जाता है कि प्यार से देख रहे हैं या किसी और निगाह से - यहां तो पहले से ही महिलायें जानती हैं कि आदमी किस निगाह से देख रहा है।
  • महिलायें फ्लर्ट के संकेत देती हैं लेकिन अधिकांश पुरुष उनको समझ नहीं पाते - पुरुष तो वाकई अनाड़ी होते हैं।
  • एक अन्य शोध के अनुसार टेस्ट क्रिकेट खेलने वालों की उम्र लंबी होती है - वन डे और 20-20 खेलने वालों के बारे में क्या ख्याल है?  जो नहीं खेलते उनका क्या?

इसी तरह की तमाम रिसर्च ये दिन अखबारों में छपती रहती हैं जिन्हे सिर्फ चटखारे लेकर ही पढ़ा जा सकता है। पता नहीं इनको कोई गंभीरता से भी लेता है या नहीं। ऐसे शोझ से कुछ फायदा भी है या नहीं या विकसित देशों के शोध संस्थानों में और कुछ काम नहीं बचा।

Wednesday, 9 April, 2008

ये अंधविश्वास कब खत्म होगा?

कल मुझे अपने  मोबाइल पर मेरी एक सहेली का SMS मिला, जो इस प्रकार है -  "Jai Hanuman" Ye Msg Mehndipur Balaji se chala hai. Ise 11 Logon ko bhej do. 8 din me Life me kuch Luck hoga, Nahin bhejoge to Unlucky ho jaoege. Try it plz.

इस तरह के संदेश अक्सर इमेल या मोबाइल में आते रहते हैं। जब हम छोटे थे तब अक्सर घर पर ऐसे संदेशों वाले पोस्ट कार्ड आया करते थे जिन्हें और 100 लोंगो को भेजने को लिखा रहता था। अब जमाना इमेल और एसएमएस को है, तो अब ऐसे संदेश इमेल और मोबाइल के इनबॉक्स में आते हैं।  ऐसा नहीं है कि ऐसा सिर्फ भारत में ही होता है, बल्कि कई बार मुझे ऐसे ईमेल प्राप्त हुये हैं जो बाहर के देशों से घूमते हुये यहां आ जाते हैं। लगता है कि लोग पढ़ लिख कर एन आर आई हो गये लेकिन अंधविश्वास से विश्वास नहीं गया।

आखिर ये सब क्या है? कहां से ऐसे संदेश शुरू होते हैं? संदेशो से लगता है कि अंधविश्वासी पूरी दुनिया में फैले हुये हैं। हिंदु, मुस्लिम, ईसाई सब इस मामले मे एक हैं। इमेल या मोबाइल संदेश प्राप्त होते ही बिना सोचे समझे इस संदेश को 10 नये लोगो को आगे भेज देते हैं।

आखिर लोग कब तक ऐसा करते रहेंगे? ये अंधविश्वास कब खत्म होगा?

Sunday, 6 April, 2008

मौसम का मिजाज

2-3 दिन से दिल्ली और उसके आसपास पता नहीं मौसम को क्या हो गया है। मौसम इतना ठंडा हो गया है कि स्वेटर निकल आये हैं। ठंडी हवायें चल रही हैं। इससे पहले मार्च के महीने में इतनी गर्मी पड़ी की तापमान 40 डिग्री तक हो गया था। कोई बतायेगा कि मौसम का ऐसा मिजाज क्यों होता जा रहा है? पहले हमारे यहां मौसम काल के हिसाब से ठीक चलता था, लेकिन अब पता ही नहीं चलता कि मौसम का मिजाज क्या होगा।

गूगल का नया ऐडसेंस प्रारुप

कुछ दिनों से आपने देखा होगा कि गूगल ऐडसेंस के विज्ञापनों में आजकल आगे NewAdsenseFormatऔर पीछे जाने के लिये संकेतक बने रहते हैं। दरअसल, कई महीनों के परीक्षणों  के बाद  आखिरकार गूगल ने इसे अपने ऐडसेंस विज्ञापनों में लागू कर दिया है। गूगल द्वारा अधिकृत ऐडसेंस ब्लॉग पर इसके बारे में भी बताया गया है। गूगल का कहना है कि इससे आपकी साइट या ब्लाग पर आने वालों को संबंधित जानकारी ढूंढ़ने में ज्यादा मदद मिलेगी।

मेरे सरकारी नौकरी वाले ब्लॉग का फोटो देखिये, इसमें लाल गोले में आगे और पीछे जाने के संकेतक दिखाइ दे रहे हैं। मेरे ख्याल से गूगल ऐडसेंस के पास किसी भी संबंधित विषय पर विज्ञापन देने वालों की संख्या बढ़ गई है और उन सब को समाहित करने के लिये इस तरह का प्रावधान किया गया है। साइट पर आने वालों के लिये इसका कोइ ज्यादा मतलब नहीं है, क्योंकि विज्ञापन में आगे पीछे देखने के लिये कोई साइट पर नहीं आता है बल्कि अपने काम कुछ का देखने या पढ़ने आता है। लेकिन अगर सचमुच आगे-पीछे जाकर विज्ञापन देखे जाते हैं तो निश्चित तौर पर विज्ञापन लगाने वाली साइट को फायदा होगा, क्योंकि ज्यादा विकल्प होने से ऐडसेंस विज्ञापन पर क्लिक होने की संभावना भी बढ़ेगी।

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