अभी कल-परसों की ही बात है, जोधपुर के पास एक सड़क हादसे में एक ही परिवार के 23 लोगों की मौत हो गई। इससे पहले बड़ोदा के पास एक दुर्घटना में कई मासूम बच्चों की जान चली गई। आये दिन समाचार पत्रों में सड़क दुर्घटना होने एवं उसके कारण होने वाली मौतों खबर छपती रहती है। लगता है हम सब इसको एक आम समाचार मान कर अनदेखा कर देते हैं। न तो सरकार में इसको लेकर कोई हलचल दिखाई देती है, न ही जनता में इसके प्रति कोई आक्रोश या जागरुकता है।
मेरे ख्याल से ये एक गंभीर मामला है। सड़क दुर्घटनायें भारत के हर कोने में घट रही हैं। आम जनता का तो कहना ही क्या, कई नामी गिरामी लोग, अधिकारी और नेता भी सड़क हादसों का शिकार बन चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह, राजेश पायलेट, साहिव सिंह वर्मा आदि अनेक नेता सड़क हादसों में मारे जा चुके हैं, लेकिन लगता नहीं कि फिर भी इसको सुधारने के बारे में सोचा जा रहा हों। भारत में पूरी दुनिया के केवल एक प्रतिशत वाहन हैं लेकिन सड़क दुर्घटनाओं का प्रतिशत छै है। इसी सें अंदाज लग सकता है कि स्थिति कितनी गंभीर है। अगर वाहन और बढ़े तो क्या होगा? दुर्घटनाओं की एक वजह तो यातायात कानून का पूरी तरह पालन न होना है, दुसरा ड्राइविंग लाइसेंस कहीं से भी कैसे भी बन जाता है। यहां पर लोगो को न तो अपनी जान की चिंता है और न ही दूसरों की। सड़क हादसों के बारे में कोई गंभीर नहीं है। ऐसे में बस खबरें छपती रहती हैं और सब ऐसे ही चलता रहता है।





