Saturday, 29 March, 2008

खिलते अमलतास

नई दिल्ली में आजकल बसंत ऋतु के कारण हर गोल चक्कर पर एनडीएमसी द्वारा विभिन्न प्रकार के रंगीन फूल खिल रहे हैं। वैसे बसंत ऋतु अब जाने को है और गर्मी का आगमन हो रहा है। बोगेनविलिया कई प्रकार के रंगों से छटा बढ़ा रही है। अमलतास के पेड़ पूरी तरह पीले हो गये हैं।  देखिये कैसे खिले हैं।

Friday, 21 March, 2008

होली की हार्दिक शुभकामनायें

हिंदी बात ब्लाग के सभी पाठक तथा हिंदी चिठ्ठाकारी की दुनिया के सभी चिठ्ठाकारों एवं उनके परिवारजनों को होली की बहुत बहुत रंग भरी शुभकामना।

आप सब की होली आनंददायक एवं मस्ती भरी हो।

Monday, 17 March, 2008

बात हिंदी फिल्म कलाकारों की

फिल्म कलाकारों की अपनी ही एक अलग चकाचौंध भरी दुनिया होती है। ये लोग उसी दुनिया में रहना पसंद करते हैं। कभी कभार ही किसी फिल्म कलाकार के मुंह से किसी समाजिक मुद्दे पर या किसी गंभीर विषय पर सुनाई पड़ता है वर्ना तो हमेशा ये लोग अपने बारे में ही बात करना पसंद करते हैं। कुछ सामान्य लक्षण इनके इस प्रकार हैं।

  • इनके मुंह से हमेशा अपने बारे में ही बात निकलती है।
  • चेहरे पर हमेशा चश्मा लगा रहता है, चाहे रात ही क्यों न हो।
  • हिंदी फिल्म कलाकार हमेशा अंग्रेजी में बात करना पसंद करते हैं। हिंदी तो इन्हें आती ही नहीं है।
  • किसी पुरस्कार समारोह में अगर इन्हें कोई पुरस्कार मिल जाने पर इनका उत्साह देखते ही बनता है। अंग्रेजी में धन्यवाद चिल्ला चिल्ला कर सबको दिया जाता है जिसमें  मम्मी-डैडी, प्रोड्यूसर, डाइरेक्टर, हेयर ड्रेसर, संगीतकार, गीतकार सबके नाम लिये जाते हैं, बस हिंदी फिल्मों के दर्शक को धन्यवाद नहीं होता है।
  • किसी भी आने वाली फिल्म की बात करते समय उसको कुछ अलग हट कर (डिफरेंट) बताते हैं। ये और बात है कि प्रदर्शित होने पर वो पुरानी तरह की ही फिल्म निकलती है।
  • किसी हीरो या हिरोइन के  साथ अफेयर की खबर मीडिया में आने पर उस को अपना एक अच्छा दोस्त बताया जाता है। ये और बात है कि बाद में यह बात सच निकलती है।
  • आइडियल या पसंदीदा कलाकार का नाम पूछने पर या तो किसी पुराने कलाकार का या फिर हॉलीवुड के किसी कलाकार का नाम बता देते हैं। साथ के किसी कलाकार तो कभी भी तारीफ नहीं होती है।
  • हमेशा उलूल-जुलुल फिल्में या हमेशा बाजारु फिल्मों मे ही काम करते है लेकिन इंटरव्यूह में हमेशा बतायेंगे कि आर्ट फिल्मों के फलां-फलां प्रसिद्घ निर्देशकों के साथ काम करना चाहते है।
  • किसी काल्पनिक ड्रीम रोल की बात करते रहते है, लेकिन उसके लेकर कभी पटकथा तैयार नहीं कराते हैं।
  • वैसे तो उन्हे देश की समस्याओं से कोई मतलब नहीं होता है, लेकिन कोई फिल्म प्रदर्शित होने से पहले हर टीवी चैनल में नजर आने लगते हैं।

Friday, 14 March, 2008

भारत दर्शन का महत्व

हमारा भारत विविधताओं से भरा देश है। इसके कण कण में व्याप्त है भांति भातिं की बातें। सैंकड़ों भाषाऐं, बोलियां, रीतियां, पहनावे के ढंग विविधता पूर्ण हैं। भारत को खुद के अनुभव से ही जाना जा सकता है।  किताबी ज्ञान के बजाये भारत भ्रमण करके ही भारत को जाना जा सकता है। भारत की विशाल विविधता के बावजूद सांस्कृतिक तौर पर भारत हमेशा से एक रहा है। भारत की विविधता पूर्ण जिन्दगी का जिसने भ्रमण कर अध्ययन कर लिया वो ज्ञाना बन गया। शायद इसी ज्ञान को सर्व जनों को पहुंचाने के उद्देश्य से शंकराचार्य जी ने भारत के चारों कोनों में चार धाम स्थापित किये थे और इनके दर्शनों को करने का आग्रह किया गया है। वैदिक काल में भी भारत के कोने कोने में शंकर भगवान के 12 ज्योतिर्लिंग, 52 देवी मंदिर एवं 4 कुम्भ मेला स्थल स्थापित करके भारत दर्शन का प्रबंध किया गया था।

भारत के कोने कोने के दर्शन करके ही भारत में कोई व्यक्ति या नेता महान बनता है। पुराने जमाने में राम और पांडवों ने अपने वनवास मे भारत को जाना था। गांधी जी भारत के कोने कोने में जाते थे और आजादी की अलख जगाते थे। नेहरुजी और इंदिरा जी सब भारत से पूर्ण परिचित थे। कुछ नेता जो अपने समय में अपने राजनितिक कौशल और प्रशासनिक कुशलता के लिये जाने जाते थे, अपने क्षेत्र के बाहर प्रभावी नहीं बन सके क्योंकि वो कभी भारत को न जान सके। आजकल कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी भी भारत को जानने की कोशिश कर रहे हैं। प्रधानमंत्री या कोई और बड़ी पोस्ट पर वो जा सकते हैं लेकिन मेरा मानना है कि अगर उन्हें नेहरुजी और इंदिरा जी की तरह प्रभावशाली जननेता बनना है तो उन्हें कम से कम 5 साल पूरे भारत का भ्रमण करके भारत को, भारत की अच्छाइयों को, भारत की समस्याओं को समझना चाहिये। ये बात दूसरी पार्टियों के नेताओं पर भी लागू होती है।

Thursday, 6 March, 2008

99 का जादू

99kaFer 

हमारे आसपास के सभी बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर्स में और लगभग सभी शोरुम में, कंपनियों के आउटलेटस में सभी मॉलों में आजकल 99 के आंकड़े का बडा जोर है। जो भी चीज खरीदने जाओ उसके दामों में 99 जरुर लगा रहता है। बात चाहे रसोई से संबंधित सामान की हो, कपड़ो की हो या सोन्दर्य प्रसाधनों की हो, 99 का जादू हर जगह चल रहा है।

दरअसल कंपनियां ग्राहकों को सामान की कीमत के बारे में पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक असर को कम करने के लिये ही ऐसा कर रही हैं। 500 रुपये का सामान ग्राहक को मंहगा लग सकता है लेकिन 499 रुपये पर ग्राहक सामान को खुशी से खरीद लेते हैं। ग्राहक के दिमाग में 400 रुपये की रेंज रहती है भले ही 499 रुपये 500 रुपये से सिर्फ 1 रुपया कम है।

पहले जब हम छोटे थे तो 99 का यह रुप सिर्फ बाटा के जूते च्पपलों के दामों में दिखता था। बाटा के दामों मे बडीं खूबसूरती से 99 और 95 का प्रयोग होता था। दाम 49.95 रुपये या 98.95 रुपये होते थे। अब तो लगभग सभी कंपनियां 99 और 95 या यूं कहें कि 9 के जादू को ग्राहकों पर चला रही हैं।

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