Wednesday, 7 May, 2008

अक्षय तृतीया - एक नया कॉरपोरेट त्यौहार

AkshayTritiya1

आजकल दिल्ली के अखबारों में छप रहे विज्ञापनों को देखकर लगता है कि एक और कॉरपोरेट त्यौहार पैदा हो गया है। जी हां पावन अक्षय तृतीया अब कॉरपोरेट जगत का नया त्यौहार है। अक्षAkshayTritiya2य तृतीया पर परम्परा के अनुसार लोग सोना खरीदते रहे हैं, क्योंकि आम तौर पर इस दिन शादी - विवाह का आयोजन होता रहा है। इस दिन को भी कंपनियों ने अपने फायदे के लिये भुनाना शुरू कर दिया है। इस बार की अक्षय तृतीया के कई AkshayTritiya3दिन पहले से ही कंपनियों ने बड़े-बड़े विज्ञापन देना शुरु कर दिया है। कंपनियां ऐसा माहौल बना देंगी कि जो नहीं भी खरीदना चाहते हैं वे भी इसके प्रभावित होकर कुछ तो खरीद ही लेंगे। आने वाले सालों में ये और भी व्यापक रुप लेगा, ऐसा साफ नजर आ रहा है। इससे पहले कॉरपोरेट जगत दीवाली, करवाचौथ और वेलेंटाइन डे को अपना कर चमकीला बना चुका है। कुछ - कुछ शुरुआत रक्षाबन्धन की भी हो चुकी है। कंपनियां अपने फायदे के हिसाब से त्यौहारों को बाजार का हिस्सा बना रही हैं। आप अखबारों मे छपे कुछ विज्ञापनों से अंदाज लगाइये कि बाजार कितनी बड़ी संभावना देख रहा है।

6 टिप्पणी:

Vibha Rani said...

dekhate jaie. sab kuchh kaa bajarii karan ho rah hai. kuchh dino mein ho sakata hai ki aap ko pata bhi na ho aur aap baajr mein khud ko bika hua paye. aaj akshya tritiya hai. mere mobile par kai din pahale se hi lubhavane offer aa rahe the. ab in lubhavani chizon ke lie lubhavane paise aur del bhi to chahiye. par dil hai ki sona hira se vaise hi door bhagata hai, jaise laal kapade ko dekha kar bhais.

Ghost Buster said...

सामान्य बात है. लोगों के पास पैसा बढ़ रहा है, या कहें पैसे वाले लोग बढ़ रहे हैं, तो बाजार तो उसे जेब से निकलवाने को तत्पर दिखेगा ही.

हर्षवर्धन said...

दिल्ली ही नहीं देश भर में ऐसे ही विज्ञापन छपे। सब पैसे की महिमा है।

Udan Tashtari said...

आप हिन्दी में लिखते हैं. अच्छा लगता है. मेरी शुभकामनाऐं आपके साथ हैं इस निवेदन के साथ कि नये लोगों को जोड़ें, पुरानों को प्रोत्साहित करें-यही हिन्दी चिट्ठाजगत की सच्ची सेवा है.

एक नया हिन्दी चिट्ठा भी शुरु करवायें तो मुझ पर और अनेकों पर आपका अहसान कहलायेगा.

इन्तजार करता हूँ कि कौन सा शुरु करवाया. उसे एग्रीगेटर पर लाना मेरी जिम्मेदारी मान लें यदि वह सामाजिक एवं एग्रीगेटर के मापदण्ड पर खरा उतरता है.

यह वाली टिप्पणी भी एक अभियान है. इस टिप्पणी को आगे बढ़ा कर इस अभियान में शामिल हों. शुभकामनाऐं.

rakhshanda said...

दुनिया का बाजारीकरण हो गया है,रिश्तों से लेकर त्यौहार तक सब पैसे का खेल बनता जारहा है.क्या कर सकते हैं.

Avinash said...

ab ye baat sirf Rakshabandhan ya Akshya Tritiya tak hi simit nahin hain. hamari sanskriti me Shraadh Paksh me koi bhi shubh karya varjit mana gaya hai. jiske chalte log shraadh paksh me nayi kharid karne se bhi bachte hain. Pichhle saal shraadh paksh se 3-4 din pahle Hindi Samachar Patra "Dainik Bhasker" me ek article chhapa tha jiska uddheshya upbhokta ko ye samjhana tha ki "Shraadh Paksh pe nayi Khareed nahin karana" sirf ek bhranti hai. aur isske baad agle hi din se usi akhbaar me vigyapan bhi aane lage (jo ki aam taur pe shraadh khatam hone pe/ navratri shuru hone pe aate hain).
Corporate jagat shayad 15 din ke iss mandi wale period ko bardasht nahin kar pa raha hai.

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