Friday, 2 May, 2008

बात बच्चों की

अपने बच्चों के लालन-पालन के दौरान मुझे कई प्रकार के सुखद और परेशान करने वाले अनुभवों से गुजरना पड़ा। यों मां बनना एक बहुत ही सुखद और भावनात्मक अनुभव है जिसको शब्दों में लिखा नहीं जा सकता है, सिर्फ उसको अनुभव किया जा सकता है। बच्चों की परवरिश के दौरान भी मां-बाप को कई प्रकार की खट्टी-मीठी स्थितियों से गुजरना पड़ता है। बच्चा पैदा होते ही सबसे पहले ससुराल और मायके वाले किसी न किसी रुप में बच्चे की शक्ल अपने किसी संबंधी से मिलाने बैठ जाते हैं। बच्चे की शक्ल अपने पक्ष के लोगों से मिलाकर एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध की जाती है। नाक बुआ से मिलती है, आंखें मौसी पर गई हैं, शक्ल चाचा से मिलती है आदि आदि टिप्पणियां सुनाई देती हैं। इसके बाद बच्चे के नाम को लेकर मां-बाप को अनेक सुझाव दिये जाते है।

मां-बाप के लिये वो क्षण बहुत ही सुखद और अत्यंत ही भावनामय होते हैं जब बच्चा पहली बार मुस्कराता है, पहली बार पलटता है, पहली बार जबाव देकर हंसता है, पहली बार घुटनों के बल चलता है, पहली बार चलता है, पहली बार बोलता है पहली बार स्कूल जाता है इत्यादि। जब बच्चा पहली बार पलट कर गिर जाता (पलंग से या कहीं और जगह) तब बहुत ही दुख होता है। अक्सर बच्चे रातों को मां-बाप को जगाते हैं, ढंग से नींद पूरी नहीं हो पाती है। सुबह ऑफिस जाना है लकिन बच्चे ने रो रोकर जान आफत में की होती है। कुछ लक्षण देखिये - शायद आप भी इनसे गुजरे होंगे, नहीं गुजरे हैं तो बच्चे होने पर आप स्वयं अनुभव कर लेंगे।

  1. जब आप बुरी तरह थके होंगे और आराम करना चाह रहे होंगे, तभी बच्चे रो-रोकर दुखी कर देंगे।
  2. जब आप खाना खाने के लिये तैयार होंगे उसी समय बच्चों के सूसू-पोटी आयेगी।
  3. कहीं जाने के लिये तैयार होते समय अगर बच्चों को पहले तैयार कर दिया तो आपके तैयार होने तक उनके कपड़े गंदे हो चुके होंगे।
  4. घर पर चाहे बच्चे टीवी से परेशान न होते हों, लेकिन अगर सिनेमा हॉल में फिल्म देखने गये तो आपको रो-रोकर फिल्म देखने नहीं देंगे।
  5. आप चाहे बच्चों को कितना ही सिखा-पढ़ा लीजिये, लेकिन किसी के यहां जाने पर या किसी के आपके यहां आने पर बच्चे पूरी छूट ले लेंगे और धमा-चौकड़ी मचायेंगे।
  6. किसी के यहां जाने पर या किसी के आने पर बच्चे खाने-पीने की वस्तुओं पर ऐसे टूट पड़ेगे जैसे कि आप कभी उन्हें ये चीज खाने को कभी नहीं देते हैं। आप कितनी भी आंखे दिखायें पर बच्चे सुनने वाले नहीं हैं। खिसियाते रहिये।

लेकिन फिर भी, बच्चों के साथ एक विशेष प्रकार का आनन्द है। बच्चों के साथ हालांकि मां-बाप की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है, लेकिन बच्चों से जिन्दगी में रोमांच बना रहता है, जिन्दगी की जीवन्तता बनी रहती है। बच्चों को लेकर आप के क्या अनुभव रहे हैं?

2 टिप्पणी:

DR.ANURAG ARYA said...

फ़िर भी कुछ सवाल है जिनका जवाब किस के पास नही है ..जैसे कि .....................................
दुनिया मे हर बच्चा चादर उडाते ही पैर मरकर क्यों उतार देता है ?
रात को अचानक आँख खुलने पर आपके पैरो या पलंग के किनारे पे क्यों मिलता है ?
जब वो सोते सोते मुस्कराता है तो एक दूसरे को जगा कर इंसान क्यों दिखाता है ?
काला टीका हर माँ लगाती है फ़िर भी दुनिया कि नजर क्यों लगती है

Udan Tashtari said...

अच्छा विश्लेषण.

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