Friday, 25 April, 2008

हिंदी फिल्म गानों का बदलता स्वरुप

अगर आपने गौर किया हो तो आपने देखा होगा कि इधर एक-दो वर्षों से हिंदी फिल्मी गानों के शब्दों मे व्यापक परिवर्तन आ गया है। हिंदी फिल्म गाने अब भांगड़ा-रैप या इंडी-रैप की तर्ज पर अंग्रेजी मिश्रित हो गये हैं। पिछले एक वर्ष के लगभग सभी हिट गाने अंग्रेजी के शब्दों से भरपूर रहे हैं। धूम, ओम शांति ओम, क्रेजी-4, रेस आदि अधिकांश फिल्मों के गानों में अंग्रेजी ज्यादा और हिंदी का कम प्रयोग हुआ है। पहले हिंदी फिल्म गाने अधिकांशत:  उर्दू व फारसी के शब्दों का प्रयोग करते थे। फिर नये दौर में हिंदी शब्दों का प्रचलन भी बढ़ा। अब हिंदी फिल्म गाने अंग्रेजीमय हो गये हैं। इसका क्या कारण है?  शायद हिंदी फिल्मों का बाहर के देशों में पसंद किया जाना और इसके कारण नये मार्केट का उदय होना या फिर आजकल जैसा अंग्रेजी का जोर बढ़ रहा है, उसी बहाव में शायद निर्माता - निर्देशक और गीतकार बह रहे है। फिलहाल इस तरह के गाने चल तो रहे हैं, कुछ तो सुपरहिट भी हुये हैं, लेकिन इससे हिंदी फिल्मों की अपनी जो एक विशेष पहचान थी, उसके नष्ट हो जाने का खतरा पैदा हो गया है। क्या पता ग्लोबलाइजेशन और अंतर्राष्ट्रीय बाजार को देखते हुये बॉलीवुड के निर्माता - निर्देशक अंग्रेजी में ही फिल्में बनाने लगें।

एक अच्छी खबर भी है, हाल के दिनों में तेलुगु के हिट गानों में हिंदी शब्दों का अच्छा खासा उपयोग किया गया है।

2 टिप्पणी:

Ankur Gupta said...

आप इतिहास उठा के देख लीजिये. परिवर्तन हमेशा हुआ है. चाहे वो साहित्य हो, कला हो या तकनीक हो. आज से ५०० साल बाद इस समय को भी किसी विशेष परिवर्तन के रूप में जाना जायेगा. इसीलिये मैं सोचता हूं कि लोग परिवर्तन से इतना ज्यादा खफ़ा क्यों हो जाते हैं. हो सकता है कि भविष्य में ये कहा जाये कि २१वीं सदी पश्चिम और पूरब के मिलन की सदी थी. मैं ऐसा इसलिये कह रहा हूं क्योंकि हम दीवाली भी मनाते हैं, लक्ष्मी पूजा भी करते हैं वहीं अंग्रेजी गानो पर डांस भी करते है. विदेशों में भी हिंदी पढ़ाई जाने लगी है. कुछ लोग इसे पश्चिमी सभ्यता के नाम पर भले ही मार काट मचाते रहें पर मैं तो इसे शुभ संकेत मानता हूं. अभी इसका परिणाम नही दिख रहा है पर भविष्य में जरूर दिखेगा. और आशा करता हूं कि वो अच्छा ही होगा.

Suresh Chiplunkar said...

कई उर्दू शब्द तो एकदम ही गायब हो गये हैं गानों से, या तो आजकल के गीतकारों की उर्दू इतनी बढ़िया नहीं है, या फ़िर अंग्रेजी और अश्लीलता के प्रभुत्व के कारण उर्दू शब्दों के प्रयोग की गुंजाइश ही नहीं बचती होगी… जो भी हो, हिन्दी(?) फ़िल्मों के गीतों का भविष्य अभी भी गुलजार साहब के हाथ ही है, संगीतकारों में जतिन-ललित से उम्मीद थी, लेकिन उनकी जोड़ी टूट गई, अब एआर रहमान से ही कुछ उम्मीद बची है…

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