फिल्म कलाकारों की अपनी ही एक अलग चकाचौंध भरी दुनिया होती है। ये लोग उसी दुनिया में रहना पसंद करते हैं। कभी कभार ही किसी फिल्म कलाकार के मुंह से किसी समाजिक मुद्दे पर या किसी गंभीर विषय पर सुनाई पड़ता है वर्ना तो हमेशा ये लोग अपने बारे में ही बात करना पसंद करते हैं। कुछ सामान्य लक्षण इनके इस प्रकार हैं।
- इनके मुंह से हमेशा अपने बारे में ही बात निकलती है।
- चेहरे पर हमेशा चश्मा लगा रहता है, चाहे रात ही क्यों न हो।
- हिंदी फिल्म कलाकार हमेशा अंग्रेजी में बात करना पसंद करते हैं। हिंदी तो इन्हें आती ही नहीं है।
- किसी पुरस्कार समारोह में अगर इन्हें कोई पुरस्कार मिल जाने पर इनका उत्साह देखते ही बनता है। अंग्रेजी में धन्यवाद चिल्ला चिल्ला कर सबको दिया जाता है जिसमें मम्मी-डैडी, प्रोड्यूसर, डाइरेक्टर, हेयर ड्रेसर, संगीतकार, गीतकार सबके नाम लिये जाते हैं, बस हिंदी फिल्मों के दर्शक को धन्यवाद नहीं होता है।
- किसी भी आने वाली फिल्म की बात करते समय उसको कुछ अलग हट कर (डिफरेंट) बताते हैं। ये और बात है कि प्रदर्शित होने पर वो पुरानी तरह की ही फिल्म निकलती है।
- किसी हीरो या हिरोइन के साथ अफेयर की खबर मीडिया में आने पर उस को अपना एक अच्छा दोस्त बताया जाता है। ये और बात है कि बाद में यह बात सच निकलती है।
- आइडियल या पसंदीदा कलाकार का नाम पूछने पर या तो किसी पुराने कलाकार का या फिर हॉलीवुड के किसी कलाकार का नाम बता देते हैं। साथ के किसी कलाकार तो कभी भी तारीफ नहीं होती है।
- हमेशा उलूल-जुलुल फिल्में या हमेशा बाजारु फिल्मों मे ही काम करते है लेकिन इंटरव्यूह में हमेशा बतायेंगे कि आर्ट फिल्मों के फलां-फलां प्रसिद्घ निर्देशकों के साथ काम करना चाहते है।
- किसी काल्पनिक ड्रीम रोल की बात करते रहते है, लेकिन उसके लेकर कभी पटकथा तैयार नहीं कराते हैं।
- वैसे तो उन्हे देश की समस्याओं से कोई मतलब नहीं होता है, लेकिन कोई फिल्म प्रदर्शित होने से पहले हर टीवी चैनल में नजर आने लगते हैं।









2 टिप्पणी:
नरगिस, बलराज साहनी आदि की याद इसीलिये और भी शिद्दत से आती है…
सही बात!
http://chavannichap.blogspot.com/
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