ई-मेल से घूमते-घामते ये फोटो मेरे पास आई हैं। बहुत ही बढ़िया, सुन्दर और मेहनत से तैयार की गई कला का बेहतरीन नमूना हैं। सभी फोटो इंटरनेट के हैं।
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अच्छी बातों का हिन्दी ब्लाग
ई-मेल से घूमते-घामते ये फोटो मेरे पास आई हैं। बहुत ही बढ़िया, सुन्दर और मेहनत से तैयार की गई कला का बेहतरीन नमूना हैं। सभी फोटो इंटरनेट के हैं।
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यह एक समस्या है जिसका शायद ही कोई हल बता सके। जब तक हम बच्चे रहते हैं, तभी तक मजे में रहते हैं। जैसे ही हम बड़ों की गिनती में आते हैं वैसे ही जीवन की सभी खट्टी-मीठी सभी तरह की बातों का सामना करना पड़ता है। फिर धीरे-धीरे कुछ अनुभवों के आधार पर आदमी अपना स्वभाव बनाता है। जिन्दगी में तरह - तरह के आईटम मिलते हैं । कुछ लोगों का समय दूसरों की चिन्ता में ही जाया होता है जैसे कि किसा के यहां क्या नया आया, कौन आया, क्यूं आया, क्यों गया उनका सारा समय दूसरे क्या करते हैं उसा में जाया हो जाता है।
पतिदेव भी बताते हैं हैं कि ऑफिसों में भी ऐसा होता है। कुछ साथी ऑफिसर सिर्फ सारा समय अपने दूसरे साथी क्या करते हैं, क्या करते हैं इसी में लगाते हैं, अपने काम से कम मतलब लेकिन दूसरों के काम में हस्तक्षेप करना, कमी निकालना सिर्फ इसी के आधार पर दिन काटते हैं।
ऐसे ही कुछ रिश्तेदार भी होते हैं जो कि अपने व्यवहार को न देखकर दूसरों के व्यवहार पर टीका टिप्पणी करते है, रिश्तेदारी में इस चीज का बहुत ही गलत प्रभाव पड़ता है क्योंकि किसी भी रिश्तेदार द्वारा की गई टीका टिप्पणी किसी फतवे का काम करती है। ऐसी कही गई बात सभी तक पहुंचती है और जिस भी व्यक्ति के लिये बात कही गयी है उसका रिश्तेदीरी में आंकलन निर्धारित करती है।
दूसरी ओर जो लोग सीधी-सादी साफ जिन्दगी जीना पसन्द करते हैं और दूसरों के बजाय अपने जीवन में क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है, स्वयं के द्वारा कोई गलती तो नहीं हो रही या किसी को कोई तकलीफ तो नहीं हो रही, हमारे द्वारा किये गये क्रिया कलापों से किसी जरुरतमंद की मदद हो इत्यादी बातों में व्यस्त रहते हैं, उन लोगों को ऐसे लोगों से बहुत तकलीफ होती है। ऐसे सीधे लोगों को कई बार गुस्सा भी आता है कि लोग आखिर क्यों सीधी साफ बात नहीं समझते, क्यों अपने पर ध्यान नहीं देते हैं दूसरों के जीवन में तांक-झांक करने के बजाय।
अपने अनुभवों के आधार पर मैं यह कह पा रही हूं। ऐसा नहीं है कि हर बार खराब अनुभव ही हुऐ हों, अच्छे भी हैं, लेकिन खराब ज्यादा हैं। दूसरों की जिन्दगी मे दखल देने वाले लोग हर जगह पाये जाते हैं चाहे वह घर, दफ्तर, रिश्तेदारी, दोस्ती या पड़ोस हो। घर पर हम इन्हें अड़ोस-पड़ोस में देख सकते हैं। कुछ लोगों को अपनी बिल्डिंग में तो क्या, पूरी सोसाइटी में क्या हो रहा है, कौन रहता है, क्या करता है, कहां से आया है और किस किस के यहां कौन-कौन आता-जाता है इत्यादि की जानकारी लेने की सदा कोशिश रहती है। उनका ध्यान सिर्फ इन्हीं बातों में रहता है। कुछ लोग अन्य प्रकार से फालतू किस्म के होते हैं। वे लोग इसी बात में लगे रहते हैं कि चन्दा कर लो, पार्टी कर लो, पार्टी करते हैं आज फलाना दिन मनाना है, आज ढिकाना दिन मनाना है। कमाल की बात ये है कि ऐसे day मनाने के शौकीन लोग चाहे 200 रुपये का ही खर्च क्यों न हो, ये लोग अपनी जेब से न लगाकर उसका भी चन्दा करना चाहते हैं।
दफ्तरों में भी ऐसा ही होता है। मेरा स्वयं का कोइ अनुभव नहीं है परन्तु पतिदेव के अनुसार ऑफिस में जो कामचोर होते हैं वो काम करने वालों के आसपास मंडराते रहते हैं और काम करने वाले व्यक्ति के काम पर निगाह रखते हैं और उसके काम में कमियां निकालने की कोशिश करते हैं। उसके काम में टांग अड़ाते हैं।
रिश्तेदार भी कैसे पीछे रह सकते हैं परेशान करने में, यह तो मैं नहीं कहूंगी कि सभी एक जैसे होते हैं पर कुछ तो बहुत ही तकलीफ देते हैं। ऐसे ही एक हमारे नजदीकी रिश्तेदार हैं, जिन्हें हर बात झूठ ही लगती है। यदि हम कोई परेशानी बतायेंगे तो वो उन्हें बहाना लगती है। एक ओर तो कहते हैं कि हमें किसी से मतलब नहीं वहीं दूसरी ओर जान भी खाये रहते हैं। अभी हाल ही में हमारे एक रिश्तेदार के यहां उनकी पत्नी का ऑपरेशन हुआ। मेरे पति रोज रोज फोन करते रहे। ऑफिस से छुट्टी लेकर मिलने भी गये । जब भी मिलते हैं कहते है कि हमने किसी को बताया नहीं है, हम ज्यादा लोगों को बतानो नहीं चाहते क्योंकि खांमखां लोग आते हैं देखने परेशानी होती है, घर में भी काम बढ़ जाता हैच लोगों की नजर लग जाती है। इसलिये हम चाहते हैं कि कम लोग आयें। दूसरी तरफ बताते हैं कि फलाना इतनी दूर से आया था, ढिकाना परिवार सहित आया था। हमारे तो अपने बेकार हैं कोई किसी को पूछता नहीं है। अब ऐसी बातों का क्या मतलब निकाला जाये?
ऐसे ही एक और रिश्तेदार हैं जो कोई काम ही नहीं करते बस सभी से उधार मांगते रहते हैं। सभी लोग परेशान आ चुके हैं लेकिन उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती है। लोग तरस खा कर मदद करते रहते हैं और उनका काम चलता रहता है।
पुराने जमाने में दिल्ली पर मुहम्मद बिन तुगलक नाम के बादशाह का शासन था। वह अपने जमाने में लिये गये फैंसलों के लिये आजतक जाना जाता है। उसका सबसे प्रमुख और चर्चित फैसला भारत की राजधानी को भारत के मध्य में स्थित दौलताबाद ले जाना था। इस फैसले से जनता को बहुत ही कष्ट हुआ था।
इसी प्रकार के जनता को परेशान करने वाले फैसले अभी भी दिल्ली के शासकों द्वारा लिये जाते हैं जिससे जनता को बहुत परेशानी होती है। सबसे ताजा फैसला है आयकर विभाग द्नारा अभी तक बनाये जा रहे पैन कार्डों को (PAN cards) को बायोमैट्रिक कार्डों में बदला जाना।
पहले तो आयकर विभाग ने बिना विचारे पैन कार्ड योजना लागू कर दी, बिना इस बात की तैयारी किये कि बड़ी संख्या में पैन कार्ड आयकर विभाग तैयार कर भी पायेगा या नहीं। लोगों ने फार्म न. 49 जमा कर दिये और वर्षों तक बहुत सारे लोगों को पैन कार्ड मिले ही नहीं। हालांकि इसे देने की जिम्मेदारी आयकर विभाग की बनती थी। नाकाम रहने के बाद विभाग ने यूटीआई (UTI) से सहयोग किया और पैन कार्ड बनवाने का काम यूटीआई को सोंप दिया गया। इसकी फीस 65 रुपये रखी गई और इस प्रकार जनता को जो कार्ड मुफ्त मिलना चाहिये वो 70 रुपये का पड़ने लगा (5 रु फार्म के मिलाकर)। पैन कार्ड से जनता को क्या फायदा है ये तो आजतक नहीं पता चला, आयकर विभाग को इससे फायदा है, आयकर दाताओं का पूरा चिठ्ठा विभाग पर इकठ्ठा हो गया। कीमत जनता चुका रही है, फायदा सरकार का।
अब जब जनता इस बात को चुपचाप स्वीकार कर के पैन कार्ड बनबा रही है तब ये नयी बात आ गई कि अब पैन कार्ड बायोमैट्रिक बनाये जायेंगे। ये बायोमैट्रिक कार्ड सभी को बनवाने पड़ेंगे। यानी जिन लोगों ने पहले पैन कार्ड बनवा भी लिये हैं उन्हें भी दुबारा कार्ड बनवाने होंगे। दुबारा सारी जनता परेशान होगी। जनता को तो पैन कार्ड से कोई फायदा है नहीं परेशानी ही परेशानी है और फायदा आयकर विभाग का है।
इसी तरह दिल्ली सरकार ने पिछले दिनों वाहनों के पंजीकरण और ड्राइविंग लाइसेंस का कम्प्यूटरीकरण करके स्मार्ट कार्ड बनाये थे। इन स्मार्ट कार्डो की फीस अब काफी रखी रखी गई है जबकी फीस पहले बहुत कम थी। इस प्रकार कम्प्यूटरीकरण की कीमत जनता चुका रही है। जनता को इस स्मार्ट कार्ड से क्या फायदा मिला किसी को पता नहीं लेकिन परिवहन विभाग को एक तो पैसा उगाहने का मौका मिल गया वहीं कम्प्यूटरीकरण से से अपना डाटाबेस भी तैयार हो गया।
कहने का मतलब है कि जनता कीमत चुकाती है और फायदा विभागों का होता है।
देश के प्रमुख उद्योग चैंबर एसोचैम के आंकलन के अनुसार साथी-नौकरी तलाशने में इंटरनेट की भूमिका बढ़ेगी। एसोचैम के अनुसार विशाल दुनिया को ग्लोबल विलेज में तब्दील कर देने वाला इंटरनेट आम आदमी की जिंदगी में भी रच बस गया है। ज्ञान के अकूत भंडार के अलावा अन्य खूबियों के चलते भी इस पर जनमानस की निर्भरता बढ़ती जा रही है। यही वजह है कि नौकरी से लेकर बिटिया के वास्ते वर तलाशने तक के लिए लोग इंटरनेट खंगालने को ही तरजीह प्रदान करते हैं। एसोचैम का मानना है कि इस रुझान के चलते चालू वित्त वर्ष के दौरान नौकरी और शादी के वास्ते जोड़े ढूंढने के लिए ढाई करोड़ लोगों द्वारा इंटरनेट का इस्तेमाल किए जाने की संभावना है। एसोचैम ने यह अनुमान इन सेवाओं के लिए रजिस्टर कराने वाले लोगों की संख्या में हो रही अप्रत्याशित वृद्धि को देखते हुए व्यक्त किया है। चैंबर का मानना है कि जीवनसाथी की तलाश के लिए इंटरनेट के इस्तेमाल में हो रही वृद्धि भारतीय समाज के सभी हलकों की टूटती रूढि़यों और उनमें आ रहे बदलाव का परिचायक भी है। अध्ययन में पाया गया है कि विदेशों में रह रहे भारतीय अपनी बेटियों और बेटों के लिए जीवनसाथी तलाशने में इस सुविधा का बडे़ पैमाने पर इस्तेमाल करते है और वे इसके लिए बड़ी रकम चुकाते हैं। एसोचैम के अनुसंधान ब्यूरो द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2005-06 और वर्ष 2006-07 के दौरान ऑनलाइन सुविधा के जरिए नौकरी और शादी के लिए जोड़े ढूंढने में सफल लोगों की संख्या में क्रमश: 63 एवं 48 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। इस आधार पर अनुमान लगाया गया है कि चालू वित्त वर्ष के दौरान ऑनलाइन सुविधा के जरिए 1.5 करोड़ लोग नौकरी पाएंगे और 95 लाख जोड़े ढूंढे जाएंगे। पिछले साल आनलाइन सुविधा के जरिए एक करोड़ लोगों को नौकरियां मिलीं और सत्तर लाख जोड़े परिणय सूत्र में बंधे। आने वाले वर्षो में यह संख्या लगातार बढ़ेगी। एसोचैम के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत ने बताया है कि वर्ष 2005-06 के दौरान इंटरनेट में वैवाहिक विज्ञापनों का कुल व्यवसाय 58 करोड़ रुपये का रहा। ऑनलाइन नौकरियों के जरिए भी इंटरनेट कंपनियों को 150 करोड़ रुपये की आय हुई। वर्ष 2006-07 के दौरान इन दोनों मदों में क्रमश: 85 एवं 245 करोड़ रुपये का व्यवसाय हुआ। एसोचैम का अनुमान है कि चालू वित्त वर्ष में वैवाहिक विज्ञापनों के व्यवसाय में 60 फीसदी की बढ़ोतरी होगी और यह 136 करोड़ रुपये का हो जाएगा। इसी तरह ऑनलाइन नौकरियों के व्यवसाय में 75 प्रतिशत की वृद्धि होगी और यह 429 करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच जाएगा।
स्त्रोत : एसोचैम का आंकलन