Sunday, 24 June, 2007

एक वर्ष और शतकीय पारी

आज ब्लागिंग की दुनिया की दुनिया में मेरा एक साल पूरा हो गया। सभी तरह के खट्टे मीठे अनुभव रहे इस दुनिया के। इस पोस्ट के साथ ही हिंदी ब्लाग में मेरे पोस्ट का शतक पूरा हो रहा है। हिंदी ब्लागिंग का दुनिया तो बड़ी निराली है, यहां अपनापन है, सहयोग है, लेकिन कुछ समय से कई विवाद भी हैं। लेकिन ये विवाद तो हम हिंदी भाषियों की पहचान हैं।

तो इस शतकीय पोस्ट में नये जमाने का फर्नीचर आपके आराम करने के लिये उपलब्ध है।

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Monday, 18 June, 2007

औरतें और गपशप

कभी बैठ कर सोचती हूँ कि कितना समय अपने आप को परेशान करने में लगाते हैं। मैं एक औरत हूँ और इसी कारण औरतों के बारे में ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकती हूँ। खास तौर पर मेरी जैसी गृहणियों के बारे में मैं ज्यादा कह सकती हूँ। घरेलू औरतों की जिन्दगी बंधी-बंधाई होती है, सुबह जल्दी-2 काम निबटाना ता कि खाली समय मिलते ही या तो पास-पड़ोस में बैठना और गप्पें मारना या फिर टीवी पर सास-बहु के सीरियल देखना। क्यों होता है ऐसा? हालांकि पहले मैं भी ऐसी ही महिलाओं में से एक महिला थी, लेकिन अब ब्लागिंग में काफी समय लग जाता है। हम जैसी घरेलू महिलायें कितना कीमती समय यूं ही बर्बाद कर देती हैं, क्यों नहीं हम अपनी सोच का दायरा बढ़ाती हैं? खाली समय में अगर हम गप्पें मारते हैं तो क्यों नहीं अच्छे ज्ञानवर्धक विषयों पर बहस करते हैं? क्यों नहीं हम सास-बहु सीरियल की जगह टीवी पर नयूज चैनल और डिस्कवरी चैनल देखते हैं? ताकि हमारी संकीर्ण सोच भी बदले और बच्चों को भी एक अच्छी सोच वाला व्यक्ति बना पायें, क्योंकि बच्चों पर सबसे अधिक प्रभाव मां का रहता है, और यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो हम आगे चलकर एक स्वच्छ, स्वस्थ, विकासशील समाज का निर्माण कर पायेंगे।

यदि हमारी वही संकीर्ण मानसिकता रहेगी, वही कहानी घर घर की, तेरा-मेरा, बुराई-भलाई में ही पड़े रहेंगे तो निश्चित ही आगे चल कर अपने परिवारों की शान्ति खो देंगे। सास-बहु सीरियलों से शिक्षा लेकर अपनों को ही तंग करते रहेंगे, बहु में, सास में, दामाद में, ननदों में कमियां निकलते रहेंगे और परिवारों की शान्ति भंग करते रहेंगे।

क्यों नहीं हम औरतें इस तरह के विषयों पर बहस करतीं कि आगे चलकर जब हमारा समय आयेगा तो हम दहेज प्रथा का विरोध करेंगी, घर की बहू-बेटियों पर अत्याचार नहीं होने देंगे, अपने अपने घरों मे शिक्षा का स्तर बढ़ायेंगे। यदि आज की आम घरेलू औरतें ऐसे विषयों पर पर चिंतन कर अमल करने लगें तो वाकई आने वालें समय में हम समाज में कुछ बुराईयां व कुरीतियां कम हो जायेंगी।

Friday, 15 June, 2007

महिलाओं को भा रहा है शेयर बाजार

भाषा की एक खबर के अनुसार अब महिलायें शेयर बाजार में काफी भाग ले रही हैं। वो दिन लद गए जब महिलाओं की आपसी चर्चा का एक बहुत बड़ा हिस्सा साड़ी की डिजाइन व पड़ोसियों की चाल-ढाल को समर्पित रहता था। कभी पति के सामने सिर्फ सास व ननद की आदतों की बुराई करने वाली महिलाएं अब इस दायरे से बाहर निकल कर शेयर बाजारों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही हैं। जाहिर है आईपीओ, डीमैट एकाउंट व सेंसेक्स में उतार-चढ़ाव अब भारतीय महिलाओं की परिचर्चाओं का अहम हिस्सा बन चुका है। महिलाओं के साथ छात्र भी निवेश की कला से पैसा कमाने की जुगत भिड़ाना सीख गए हैं। तभी तो इन लोगों के लिए शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बोरियत का विषय नहीं, बल्कि आय बढ़ाने का माध्यम बन गया है। घरेलू महिलाओं में निवेश के प्रति जागरूकता पैदा करने का श्रेय बिजनेस चैनलों को जाता है। अगर 50 प्रतिशत घरेलू महिलाएं टेलीविजन पर सास-बहू के धारावाहिक देखती हैं तो 50 फीसदी ऐसी भी हैं जो अर्थव्यवस्था से संबंधित कार्यक्रमों में दिलचस्पी ले रही हैं।

इसके अलावा महिलाओं का शेयर बाजार में बड़ी संख्या में भाग लेना इंटरनेट के ब्राडबैंड कनेक्शन के सुलभ और सस्ते रुप में उपलब्ध होने से भी संभव हुआ है। अब आम तौर पर भारतीय मध्यमवर्गीय परिवारों में बच्चों की पढ़ाई के लिये कंप्यूटर खरीदा जाता है। इसी कंप्यूटर पर अब ब्रॉडबैंड कनेक्शन ने इंटरनेट के द्वारा शेयर की खरीद-फरोख्त को आसान कर दिया है। बड़ी संख्या में महिलायें खास कर गृहणियां अपने काम से फुर्सत निकाल कर शेयर की खरीदा-बेची करती हैं।

मेरी कई पड़ोसने अब यह काम अपने घर से करती हैं। कई बार तो हम लोग आपस में बातचीत में शेयर बाजार की बातें भी करती हैं। कई महिलायें महीने में इतना पैसा कमा लेती हैं कि जितना उन्हें नौकरी में नहीं मिलता।

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