Saturday, 31 March, 2007

इन नामों का क्या मतलब है

उत्तर प्रदेश में आजकल चुनाव का माहौल है। अत: चुनाव से संबंधित खबरें समाचार पत्रों में छपती रहती हैं। एक खबर के अनुसार एक वर्तमान विधायक ने अपने क्षेत्र के जिन गांवों का दौरा किया उनके नाम इस प्रकार हैं। जावली, डगरपुर, गोठरा, निठौरा, घिटौरा, सिरौरा, नवादा, गौना, सिंगौला, खेकड़ा, रटौला, पांची, चमरावल, कहरका, मुकारी, घटौली, पटौली, ढिकौली, पिलाना इत्यादि।

खबर के इन गांवों के नामो को पढ़ कर लगा कि यह नाम किस आधार पर रखे गये होंगे। मैं कोई इतिहास की छात्रा नहीं रही हूँ बल्कि मैं तो आई टी (IT) की छात्रा रही हूँ, लेकिन सामान्य जानकारी के अनुसार पुराने समय से ही गांवों, कस्बों व शहरों के नामों को रखने का कोई ठीक-ठीक सा कारण मालूम होता है। अत: यह एक कौतुहल का विषय है कि ऊपर लिखे नामों का क्या आधार रहा होगा। ये नाम गाजियाबाद जिले के एक विधानसभा क्षेत्र के हैं, यदि अन्य सभी जगहों का यदि अध्ययन किया जाये तो काफी नाम ऐसे मिलेंगे जो कौतुहल पैदा करेंगे।

गांवों, कस्बों व शहरों के नामों को रखने का आधार जितना मुझे समझ आया है उसके अनुसार नाम, खासकर गांवों और मुहल्लों के नाम अधिकतर किसी व्यक्ति या किसी जाति या किसी इलाके की ओर इशारा करते हैं। मसलन, जगतसिंहपुरा, टीकरी ब्राह्मणान, खटिकाना, सेवला जाट, पुरवियों का मोहल्ला, जटवाड़ा, मुहल्ला कायस्थान इत्यादि।

कुछ प्रचलित आधार ये हैं:

  • पुर - किसी विशेष कारण, व्यकि विशेष, जाति इत्यादि के ऊपर रखे हुये नाम जैसे कि जयपुर, उदयपुर, बाजपुर, ईश्वरपुर, इस्लामपुर, आदि।
  • बाद - अधिकांश मुस्लिम लोगों द्वारा या उनके नामों पर बसाये गये गांव, शहर जैसे हैदराबाद, उस्मानाबद, फिरोजाबाद, गाजियाबाद आदि।
  • गढ़ी - अधिकांश वह जगह जहां पर छोटी सैनिक चौकी या छोटा-मोटा किला इत्यादि होता था, छोटे राजा, जमीदार या सामंतों का रहने की जगह क्योंकि उन्हें बड़े राजा, बादशाह, महाराणा इत्यादि के लिये यहां पर सैनिक रखने होते थे। जैसे गढ़ी भदौरिया, प्रह्लाद गढ़ी आदि।
  • गढ़ - वह स्थान जहां कुछ बड़े किले या सैन्य व्यवस्था थी जैसे कि कुम्भलगढ़, सज्जनगढ़।
  • सर - जहां पर पानी के बड़े तालाब इत्यादि थे, मसलन अमृतसर, मुक्तसर, गरड़ीसर आदि।
  • डेरा - जहां पर किसी बडे फकीर या फौज के बड़े ओहदेदार का डेरा था जैसे कि डेरा बाबा फरीद खां, डेरा इस्माइल खां, डेरा गाजी आदि।
  • नगर - किसी के नाम पर या किसी के द्वारा बसाया हुआ, रिहाइशी इलाका जैसे विजयनगर, श्रीनगर आदि।
  • मंडी - नाम से ही पता चलता है कि ये मंडी होगी जैसे मंडी सईद खां, लोहा मंडी आदि।

इसके अलावा गांवों के नामों में इलाके के आधार पर भी कुछ वर्गीकरण है जैसे कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में नाम के नगला शब्द प्रचलन में है जैसे कि नगला धनी, नगला छउआ, नगला पदी आदि, वहीं पश्चिमी राजस्थान के गांवों के नाम में वास और ढाणी का खूब प्रयोग होता है जैसे कि गैलावास, मीणावास, ठाकुरावास, ईश्वरसिंह की ढाणी, पटवारी की ढाणी आदि। गांवों के नाम के बारे में एक दिलचस्प बात ये है कि यदि नाम में खुर्द है तो एक गांव उसी नाम का कलां भी होगा जैसे कि अगर एक गांव है टीकरी खुर्द तो पड़ोस में एक गांव टीकरी कलां भी होगा। पूरा भारत तो मैंने घूमा नहीं है इसलिये बाकि जगह का कुछ पक्का पता नहीं है। कश्मीर में 'मर्ग' होते है जिनका मतलब कोई कश्मीरी ही बता सकता है जैस गुलमर्ग, सोनमर्ग, खिलनमर्ग आदि। श्रीनगर कश्मीर में पुराने शहर (down town Srinagar) में उस इलाके के नाम में कदल आता है जहां पर पुल होते हैं।

अब आप लोग इस पृष्ठभूमि में बतायें कि विधायक साहब द्वारा घूमें गये गांवों के नामों का क्या आधार है? गांवों, कस्बों व शहरों के नामों को रखने के बारे में और जानकारी आप लोग यहां दे सकते हैं।

Friday, 30 March, 2007

उफ यह हिन्दी

जब भी मैं बाजार या कहीं जाती हूँ तो मुझे गलत और उलटे मतलब की हिंदी देखकर बहुत ही अफसोस और गुस्सा आता है। जब हम अपने बच्चों को अंग्रेजी के शब्दों की स्पेलिंग याद कराने के लिये उन्हें डराते-धमकाते हैं, उनसे अंग्रेजी सही लिखने की उम्मीद करते हैं, तो अपनी मातृ-भाषा के बारे में कैसे चलताऊ रवैया अपना लेते है। बहुत जगह गलत-सलत हिंदी लिखी रहती है। कुछ जो अभी याद आ रही हैं वो मैं बताती हूँ:

  • उत्तर भारत के अधिकांश ट्रकों के पीछे 'मां का आशीर्वाद' लिखा होता है। लेकिन यह हमेशा ही गलत रुप में 'मां का आर्शीवाद' लिखा होता है।
  • अधिकांश दर्जियों की दुकानों पर हिंदी में 'शूट स्पेशलिस्ट' लिखा होता है, जबकि अंग्रेजी में हमेशा सही Suit Specialist लिखा होता है।
  • खोमचे पर इडली-डोसा बेचने वालों की दुकानों पर 'इटली-डोसा' लिखा रहता है। कई बार यह और भी गलत रुप में इटली-डोशा लिखा होता है।
  • सभी जगह पर सड़क (रोड - Raod) के लिये 'रोड़' लिखा रहता है।
  • कई जगह जहां सड़क पर दुर्घटना होने की काफी संभावना रहती है, वहां लगाये हुये नोटिस बोर्ड पर अक्सर 'दुर्घटना संभावित क्षेत्र' की जगह 'दुर्घटना ग्रस्त क्षेत्र' लिखा रहता है। क्या उस क्षेत्र के साथ दुर्घटना होने की संभावना होती है?

इन बातों का क्या समाधान है?

पहले भी उदय चंद्र सिंह जी इसी तरह की बातों से परेशान होकर नोएडा को बंदर खा गया नाम का आलेख कस्बा में लिख चुके हैं।

Thursday, 29 March, 2007

घटने लगा सरकारी नौकरियों का रुतबा

प्रेस ट्रस्ट की एक खबर के अनुसार कभी स्थायित्व के चलते आकर्षण का केंद्र रही सरकारी नौकरियों का रुतबा अब घटने लगा है। निजी कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले भारी-भरकम वेतन और बेहतर सुविधाओं के लालच में लोग अब सरकारी नौकरियों को छोड़कर निजी कंपनियों में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। हाल-फिलहाल में आयकर विभाग के साथ-साथ कस्टम व सेंट्रल एक्साइज विभाग को इस समस्या से सबसे ज्यादा जूझना पड़ रहा है। बीते कुछ महीनों के दौरान उसके तकरीबन 100 बड़े अधिकारियों ने निजी कंपनियों में नौकरी करने के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) लेने का आवदेन किया है। आयकर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि टाटा समूह, रिलायंस, अन‌र्स्ट यंग, इंडिया बुल्स व प्राइसवाटरहाउसकूपर्स जैसी कंपनियां हमारे सर्वाधिक अनुभवी टैक्स अधिकारियों को अपने यहां चार-छह गुना अधिक वेतन देने की पेशकश कर रही हैं। इसी वजह से लगभग हर हफ्ते एक या दो आयकर अधिकारी विभाग के पास अपने वीआरएस आवेदन पत्र जमा कर रहे हैं। इसी वजह से बीते कुछ महीनों के दौरान ए-ग्रेड के 26 आयकर अधिकारी सरकारी नौकरी छोड़ चुके हैं। इसके अलावा बीते वर्ष कस्टम और सेंट्रल एक्साइज विभाग के 55 अधिकारियों ने निजी कंपनियों की राह पकड़ ली थी। 288 नए पद सृजित होने के बाद वर्तमान में आयकर विभाग में ग्रेड-ए अधिकारियों की संख्या 4400 है। वहीं केंद्रीय एक्साइज व कस्टम विभाग में यह आंकड़ा 2500 है।

इससे पहले सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों खासकर रक्षा मंत्रानय के DRDO से भी काफी वैज्ञानिक छोढ़कर जा चुके हैं।

Sunday, 25 March, 2007

एक चिठ्ठी बीसीसीआई के अध्यक्ष श्री शरद पवार के नाम

एक चिठ्ठी माननीय श्री शरद पवार, अध्यक्ष, भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के नाम

यह चिठ्ठी एक अनाम भारतीय क्रिकेट प्रेमी की ओर से अध्यक्ष बीसीसीआई को लिखी जा रही है। इसे करोड़ो भारतीयों की तरफ से लिखा माना जाये।

आदरणीय शरद पवार जी,

सादर नमस्कार,

आज मैंने रात भर जाग कर भारत और श्रीलंका के बीच विश्व कप क्रिकेट 2007 के लिये हुये मुकाबले को देखा। जैसी करोंड़ो भारतीयों की इच्छा थी, उसके अनुसार न खेलते हुये भारत की टीम ने श्रीलंका के आगे घुटने टेक दिये। मेरे अनुसार भारत की क्रिकेट टीम अक्सर ही ऐसा करती रहती है। इसलिये मैं आपके सामने यह प्रस्ताव रखना चाहता हूँ कि भारत की क्रिकेट टीम के वर्तमान खिलाड़ियों की जगह मुझे और मेरे मोहल्ले के तमाम लड़कों को भारतीय टीम में रखा जाना चाहिये। हमें भी मौका मिलना चाहिये। वर्तमान भारतीय क्रिकेट टीम के एक एक सदस्य को 1 लाख रुपये प्रति वन डे मैच के हिसाब से मिलते हैं (शायद इससे ज्यादा ही मिलते हैं) , लेकिन फिर भी यह टीम हार जाती है। शरद जी, हम लोग यह काम 50 हजार में करने को तैयार हैं । यानी की आखिर टीम को हरवाना ही है तो हम 50 प्रतिशत डिस्काउंट पर टीम हराने को तैयार हैं। हम टीम को हरवाने की पूरी गारंटी लेंगे (अगर आप लोग चाहें तो इससे भी कम पर बात कर सकते हैं)। जो काम भारत की टीम 50 ओवर में करती है, वो हम 25 ओवर में ही करवा देंगे। आप एक मौका तो दे कर देखिये।

शरदजी, यकीन जानिये इससे कई फायदे होंगे। आप देखेंगे कि इसमें सबका फायदा है, हमारा, आपका, आम जनता का और देश का। आइये, मैं आपको बताता हूँ कि ये सब फायदे कौन कौन से हैं।

सबसे पहला फायदा तो यह हमें ही होगा। हम भारत की टीम को परमानेंटली हरवाने के जो पैसे लेंगे उससे हमारी गरीबी दूर होगी। हम आम भारतीयों को भी क्रिकेट की ग्लैमर भरी दुनिया देखने को मिलेगी।

जनता का देखिये कितना फायदा होगा, जब हम गारंटी के साथ भारत की क्रिकेट टीम को हरवायेंगे तो अरबों-करोड़ों भारतीयों को जीत की कोई आशा ही नहीं होगी और फिर किसी भी भारतीय क्रिकेट प्रेमी का दिल नहीं टूटेगा। हम आशा के अनुरुप ही प्रदर्शन करेंगे। जब दिल ही नहीं टूटेगा तो देश के लोग-बाग खुश रहेंगे और उनकी उत्पादकता बढ़ेगी। टीवी से लोग कम चिपकेंगे और काम के ऊपर ध्यान देंगे।

मुझे और मेरे साथियों या मेरे जैसे ही करोड़ों भारतीयों में से ही किसी को खिलाने से देश का भी बहुत फायदा है। जब हम गारंटी से हारेंगे तो देश में कहीं भी विरोध स्वरुप धरने प्रदर्शन नहीं होगा। देश की कानून व्यवस्था काबू में रहेगी। हम 25 ओवर में ही भारत की क्रिकेट टीम को हरवायेंगे तो करोंड़ो भारतीय जो क्रिकेट टीवी पर देखते हैं वो टीवी को जल्द ही बंद कर देंगे इससे बिजली की कितनी बचत होगी आप अंदाज लगा सकते हैं। हमारी आधी मैच फीस से भी देश को आर्थिक फायदा होगा।

अब मैं आपको बताता हूँ कि मुझे भारतीय क्रिकेट टीम में मौका देने में आपका कितना फायदा है। अब ये तो सभी जानते हैं कि आप एक मंझे हुये राजनीति के खिलाड़ी हैं। आपकी हर चाल में राजनीतिक नफा-नुकसान का आंकलन होता है। मुझे मौका देने में आपका राजनीतिक फायदा भी बहुत है। सर्वप्रथम तो आप मुझ जैसे आम आदमी को मौका देकर देस में यह प्रचार कर सकते हैं कि आप और आप की सरकार आम आदमी का कितना ध्यान रखती है। "आपकी सरकार आम आदमी के साथ" यह नारा आप लगा सकते हैं। हमारी गरीबी दूर होगी तो आप हल्ला कर सकते हैं कि आप का शासन में आम आदमी की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। जब टीवी पर मैच ज्यादा देर तक न देखे जाने के कारण टीवी बंद होने का कारण बिजली की बचत होगी, देश में बिजली की उपलब्धता बढ़ेगी जिसे भी आप अपने पक्ष में भुना सकते हैं। आप भी निश्चित होकर किसानों की समस्याओं की ओर ज्यादा दे पाओगे और विपक्षियों का मंह बंद कर पाओगे।

अत: आप से विनम्र निवेदन है कि एक बार मुझे क्रिकेट टीम में मौका जरूर दीजिये और आम आदमी के हाथ मजबूत कीजिये।

आपका,

एक भारतीय क्रिकेट प्रेमी - अ.ब.स.



जुड़ी हुई कड़ी : वैधानिक चेतावनी

Wednesday, 21 March, 2007

मोहिन्दर जी से क्षमा पार्थना

मैंने अपने पिछले चिठ्ठे में मोहिन्दर कुमार जी पर चिठ्ठा चोरी का इल्जाम लगाया था। सभी लोगों की टिप्पणियों को पढ़ के और इस बात को समझ के कि दोनों का सूचना स्त्रोत एक ही हो सकता है, मैं मोहिन्दर कुमार जी से अपनी गलती मानते हुये क्षमा मांगती हूं। मोहिन्दर कुमार जी को हुई वेदना के लिये मुझे बहुत खेद है।

उम्मीद है मोहिन्दर जी मुझ नासमझ को क्षमा करेंगे। कृपया अपने पोस्ट से मेरी टिप्पणियां हटा दें।

चिठ्ठा चोरी हो गया

हालांकि हिन्दी चिठ्ठा जगत में चिठ्ठे की चोरी होना अब कोई नई बात नहीं रही है। अब हिन्दी चिठ्ठा चोरी होने की बारी मेरी है। किसी मोहिन्दर कुमार द्वारा संचालित हमारा संसार ब्लाग पर मेरी पुरानी चिठ्ठा रचना "भारत का नियाग्रा फॉल" ऐसे की ऐसे ही पेश की गई है। यहां तक कि चिठ्ठे का शीर्षक भी वही है।
अब बताइये क्या करें। हिंदी ब्लागिंग अभी शैशव अवस्था में ही है, और अभी से ये हाल है तो आगे क्या होगा?

Tuesday, 20 March, 2007

वैधानिक चेतावनी

एक खबर के अनुसार जामनगर में एक आदमी भारत की बंगलादेश के खिलाफ विश्व कप में हार के सदमे को बर्दाश्त न कर पाने के कारण दिल का दौरा पड़ने से मर गया।


इस बात को ध्यान में रखकर मेरे ख्याल से एक वैधानिक चेतावनी भारत द्वारा खेलने वाले सभी क्रिकेट मैच प्रसारणों पर तुरंत प्रभाव से प्रसारित की जानी चाहिये

"यह प्रसारण एक हॉरर शो है। इसको कमजोर दिल वाले न देखें। बच्चे अपने माता-पिता के साथ देखें। इस मैच में कुछ भी हो सकता है। भले ही भारत की ओर से एक दीवार (Wall), एक नवाब, एक सुल्तान, एक महाराजा, एक युवराज, एक मास्टर-ब्लास्टर खेल रहे हों, या फिर कोई दो लीटर दूध पीने वाला खेल रहा हो, भारत कभी भी, कहीं भी, किसी से भी हार सकता है। भारत की टीम आम आदमी की तरह प्रदर्शन कर सकती है। इस चेतावनी के बाद भी अगर कोई व्यक्ति अपनी मर्जी से मैच देखता है, तो अपने हर्जे-खर्जे का जिम्मेदार खुद होगा "

Friday, 16 March, 2007

शादी है जी

शादी का मौसम है। हर तरफ घुड़चड़ी और बैंडबाजों का माहौल है। लोग सड़कों पर पटाखे चला रहे हैं, और नाच रहे हैं। शहनाई का सुर खुशियों में इजाफा कर रहा है। सड़क पर जश्न ही जश्न है। लेकिन इस जश्न के पीछे गाड़ियों का एक लंबा काफिला ऐसे लोगों का है जो उस बारात का हिस्सा नहीं हैं। सड़क पर जश्न मना रहे लोगों के कारण जाम की जो स्थिति उपजी है, वो उसी जाम के शिकार हैं। खुशियों का माहौल उनके लिये शोर-शराबे से ज्यादा कुछ भी नहीं है। करें भी तो क्या करें! बस मन ही मन कुढ़न के अलावा और चारा भी तो नहीं हैं। सोच रहे हैं कि इन लोगों में जरा भी सिविक सेंस नहीं है। अपनी खुशी में दूसरों को परेशान करने का अधिकार इन्हें किसने दे दिया?

दिन बदला और शादी की बारातों का सीन भी बदल गया। आज वो लोग एक बारात का हिस्सा बन गये जो कल तक जाम में फंसे कुढ़ रहे थे। आज मौका इनकी खुशी का है तो भला कोई कमी कैसे छोड़ दें? आज वो सड़क पर नाच-गा रहे हैं, पटाखे जला रहे हैं और मस्ती में झूम रहे हैं, पटाखे जला रहे हैं और मस्ती में झूम रहे हैं। आज उन्हें बारात के पीछे खड़े गाड़ियों के काफिले की कोई चिंता नहीं है। आज उन्हें नागरिक दायित्व भी याद नहीं आ रहे। बस सड़क पर नाचना, जाम लगाना व आयोजन स्थल के पास की जगह को अपनी बपौती समझना आदि-आदि उनके अधिकार में शामिल हैं। कर्तव्य बोध से अनजान हैं। उन्हें पता है कि कल जब वह जाम में फंसे थे तो उनकी क्या मानसिक स्थिति थी। आज नहीं फंसे हैं। आज उनकी खुशी का दिन है तो दूसरों को दुख तो झेलना ही पड़ेगा।

रोज कुछ लोग झूमते हैं, और रोज कुछ लोग कुढ़ते हैं। आखिर सामाजिक दायित्वों को समझने की पहल कौन करेगा?



30-40 साल पहले का समय है। बारात लड़की वालों के यहां जानी है। सभी बारात की तैयारियों में व्यस्त हैं। बच्चे नये कपड़े मिलने की खुशी में आनन्दित हो रहे हैं। बड़े लोग करीने से कड़क कलफ लगी हुई प्रेस किये हुये कपड़े पहन रहे हैं। लड़के के पिताजी ने रिश्तेदारी में एवं अड़ोस पड़ोस सब जगह पहचान के लोगों को व्यक्तिगत तौर पर न्योत दिया है। सब लोग खुश हैं, बारात में जो जाना है, वहां आवभगत होगी, सत्कार होगा, इज्जत होगी। लेकिन ये क्या लड़के के मामाजी जरा नाराज नजर आ रहे हैं। क्या बात हो गई? अजी, बस उन्हें लग रहा है कि उन्हें ज्यादा पूछा नहीं जा रहा है। लड़के के पिता तुरंत उनको मनाने आते हैं । थोड़ी मान-मनौव्वल के बाद वो मान जाते हैं। ऐसे ही बारात में जाने से पहले कई रिश्तेदार और पास-पड़ोस के लोग थोड़े नखरे दिखाते हैं और लड़के वालों को उन्हें बारात में ले जाने के लिये मनाना पड़ता है। लड़की के घर बारात पहुंचने पर बारात का स्वागत होता है। लड़की के घर के बड़े रिश्तेदारों से लड़के पक्ष के रिश्तेदारों की पहचान और मिलनी कराई जाती है। बरातियों के खाने-पीने का इंतजाम घरातियों से अलग किया गया है। सब खुश हैं।

समय बदलता है, अब का समय आ गया है। अब किसी के पास समय नहीं है। लड़के वालों ने सभी जगह शादी के कार्ड भेज दिये हैं। कार्ड में साफ लिखा है "कृपया इस कार्ड को ही व्यक्तिगत बुलावे की मान्यता प्रदान करें" । अब कोई रूठ जाये या नाराज हो जाये किसी को परवाह नहीं है। मामाजी नाराज हो गये तो हो जाने दो। ये भी हमारे काम नहीं आते हैं। अड़ोस-पड़ोस वालों को तो कोई चाहता भी नहीं कि वो बारात में जायें। दहेज अब ज्यादा लिया जाता है लेकिन रिश्तेदारों और अड़ोस-पड़ोस वालों से छुपाकर। लड़की वाले भी अब बाराती और घराती सब का इंतजम एक जैसा और एक ही जगह करते है। अब लड़की वाले भी लड़के वालों की तरह सूटेड-बूटेड सजे-धजे नजर आते हैं। बारातियों के आने तक खाने-खिलाने का एक दौर पूरा हो चुका होता है। पता ही नहीं चलता कि कौन लड़की वाला है और कौन घर वाला। लड़के की शादी है कि लड़की की शादी है ये फर्क भी पता नहीं चलता। रुठने मनाने की तो कौन कहे, कोई पूछने वाला तो हो?

रिश्तों के इस गिरावट के दौर के लिये जिम्मेदार कौन है?

Tuesday, 13 March, 2007

आईआईटी मुंबई में इंटरनेट पर रोक

विश्व के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग संस्थानों में से एक आईआईटी (IIT Mumbai) के छात्रों पर हॉस्टल में इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई है। यह कदम आईआईटी मुंबई के प्रबंधन ने यह कहते हुए उठाया है कि इससे छात्र सर्फिग, गेम्स और ब्लागिंग के लती हो रहे हैं, जिसका गंभीर असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। प्रबंधन का यह भी कहना है कि हॉस्टल में इंटरनेट से छात्रों में अकेलेपन और आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इंजीनियरिंग छात्रों पर इंटरनेट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने का फैसला सही ठहराते हुए आईआईटी मुंबई में छात्र मामलों के डीन प्रकाश गोपालन नेकहा कि छात्रों को हॉस्टल में इंटरनेट के असीमित इस्तेमाल की सुविधा सिर्फ इसलिए दी गई थी कि इससे इन्हें पढ़ाई में मदद मिलेगी लेकिन छात्र इसका इस्तेमाल चैटिंग, सर्फिग, फिल्म और संगीत की डाउनलोडिंग के साथ ब्लागिंग और गेम्स में कर रहे थे। उन्होंने कहा कि इंटरनेट की वजह से छात्रों ने खुद को हॉस्टल के कमरों में कैद कर लिया है और वह यह तक नहीं जानते कि उनके बगल वाले कमरे में कौन रह रहा है। देश के सभी सातों आईआईटी छात्रों में अवसाद और बेहद अस्त-व्यस्त दिनचर्या एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। इसी का दुखद परिणाम है कि पिछले पांच सालों में नौ छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।

Tuesday, 6 March, 2007

भरमाने वाले चित्र

कुछ चित्र ईमेल के जरिये अक्सर देखने को मिलते रहते हैं। इम बार किसी मित्र ने भरमाने वाले ऐसे चित्र भेजे कि देख कर सिर चकरा गया। हालांकि उस दिन होली थी और थोड़ी सी ठंडाई (भांग वाली) पी थी, लेकिन वो तो बहुत थोड़ी थी। इसलिये पक्का करना पड़ा कि ये चित्र ही घुमावदार हैं। कुछ चित्र इनमें से पहले देखे हुये थे, लेकिन कुछ नये और अनदेखे हैं। लिहाजा इनको चिठ्ठे में समाहित करके सार्वजनिक करने का इरादा कर लिया। तो आप सब भी इन चित्रों को देखिये और कुछ देर तक भ्रम की स्थिति में रहिये।

बैंगनी लाईने सीधी हैं या घूमी हुई?

बीच का कौन सा गोला बड़ा है?

चौकोरों के बीच में गोले किस रंग के हैं?

आदमी का चेहरा और अंग्रेजी का L से शुरू होता शब्द

क्या ये संभव है?

ध्यान से लगातार देखिये।

Friday, 2 March, 2007

अपने देश में नहीं रहना चाहते अमेरिकी

न्यूयार्क : भारत में हम लोग आमेरिका को सपनों का देश मानते हैं। लाखों भारतीयों का सपना अमेरिका में बसने का होता है। अमेरिका में बसने के लिये हम लोग कानूनी और गैरकानूनी किसी भी तरीके से कोशिश करते हैं। भले ही हमारे लिये अमेरिका सपनों का स्वर्ग हो, लेकिन सच तो यह है कि खुद अमेरिकी ही अब अपने देश में नहीं रहना चाहते। एक सर्वे के निष्कर्षो को सच मानें, तो लाखों अमेरिकी अपने देश को छोड़ने का पक्का इरादा कर चुके हैं। न्यू ग्लोबल इनीशिएटिव्स के नए सर्वे के मुताबिक अब तक 30 लाख से ज्यादा नागरिक अमेरिका छोड़ कर जाने का फैसला कर चुके हैं। साथ ही, 30 लाख अन्य अमेरिकी इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। एक करोड़ 40 लाख अमेरिकियों ने इस मुद्दे पर कहा कि वे इस मुद्दे पर पेशोपेश में हैं। वहीं 60 लाख लोगों ने कहा कि वे विदेशों में मकान खरीदना पसंद करेंगे। न्यू ग्लोबल इनीशिएटिव्स के सीईओ बाब एडम्स ने कहा कि यह संख्या हमारी उम्मीद से कहीं ज्यादा है। यह सर्वे जून, 2005 से शुरू होकर दिसंबर, 2006 तक चला था। एडम्स ने कहा कि सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 25 से 35 वर्ष आयु वाले नागरिक अमेरिका छोड़ने को लेकर सबसे ज्यादा उत्सुक हैं। एडम्स ने कहा कि अमेरिका छोड़ने इरादा रखने वालों की पसंदीदा मंजिल यूरोप है। यहां कम से कम 43 फीसदी ऐसे अमेरिकी बसना चाहते हैं। इसके बाद नंबर आता है कनाडा का, जहां 14 प्रतिशत लोग रहना चाहते हैं। लेकिन सबसे कम लोग मध्य पूर्व (2.6 प्रतिशत) और अफ्रीका (1.9 फीसदी) में बसना चाहते हैं। इस सर्वे में भाग लेने वाले 28 फीसदी लोग पहले ही विदेशों में रह चुके हैं।

तो क्या अब भी अमेरिका में बसना चाहेगे?

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