हाल ही में संजय बेंगाणी जी ने तरकश पर अपने ब्लॉग में बताया था कि होने और दिखने में फर्क होता है। अंग्रेजी न आती हो तो भी बोलें जरुर, बुद्धिमान न हों लेकिन दिखें जरूर, "धर्मनिरपेक्ष" दिखें जरूर इत्यादि।
इधर आई टी इंडस्ट्री में भी कुछ ऐसा ही है। यहां ओपेन सोर्स की बात करना लेटेस्ट फैशन है। 95% से ज्यादा लोग अपने व्यक्तिगत कंप्यूटर या लैपटॉप पर माइक्रोसोफ्ट की विंडोज और अन्य सोफ्टवेयर इस्तेमाल करते हैं, लेकिन बातचीत में "स्टाइल" ओपेन सोर्स सोफ्टवेयर की तारीफ से ही आती है। अधिकांश लोग अपने कंप्यूटर पर पाइरेटेड विंडोज व ऑफिस सोफ्टवेयरों का प्रयोग करते हैं, ओपेन सोर्स के निशुल्क सोफ्टवेयर का प्रयोग नहीं करते हैं, लेकिन ओपेन सोर्स की तारीफ ऐसे करते हैं जैसे कि सबसे ज्यादा इन्होंने ही ओपेन सोर्स के सोफ्टवेयर के निर्माण में योगदान दिया हो।
इसलिये संजय जी की बात बिलकुल सही है कि होने और दिखने में फर्क है। लोगों की काम कहना कुछ और करना कुछ है।








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