अभी कल ही ये वाक्या हुआ। मेरी पाँच साल की बिटिया पड़ोस के बच्चों के साथ खेल रही थी। खेलते-खेलते बच्चे छोटे-छोटे कंकड़ फेंकने लगे। ये देख कर मैंने बच्चों को डांटा और ऐसा करने के लिये मना किया। बच्चे अपने आप को निर्दोष साबित करने के लिये एक दूसरे का नाम लगाने लगे कि इस बच्चे ने कहा था पत्थर फेंकने के लिये, उस बच्चे ने कहा था पत्थर फेंकने के लिये आदि आदि। इस पर मैंने सबको डांटते हुये कहा कह कि अगर कोई बच्चा आपको कुंऐ में कूदने को कहेगा तो क्या तुम कूद जाओगे? बच्चों ने पहले तो मना कर दिया लेकिन एक चार साल के बच्चे ने हिम्मत करके पूछ लिया कि आंटी ये कुआं क्या होता है? जितना सम्भव हो सकता था उतना तो मैंने समझा दिया कि कुआं क्या होता है। लेकिन पता नहीं बच्चे क्या समझे।
दरअसल हमारे आस-पास के सारे इलाके में कहीं भी कोई कुआं नहीं है। यहां तक कि आसपास के मंदिरों में भी कहीं कोई कुआं नहीं है। शहरों से कुंए लगभग गायब हो चुके हैं। अब बच्चे सिर्फ किताबों में ही पढ़ सकते हैं कि कुआं क्या होता है। पानी भरने वाला कुआं हमारी संस्कृति का एक हिस्सा रहा है। कई कहावतों, कहानियों, किस्सों, लोक गीत और परम्परायो खास तौर पर शादी की रस्मों मे कुंऐ का खासा महत्व है। लेकिन कुओं के गायब होने के साथ ही हमारी संस्कृति का ये हिस्सा भी गायब होने का कगार पर है। अब तो गांवों में भी कुंए कम होते जा रहे हैं। क्या हम अपनी इस छोटी लेकिन महत्वपूर्ण धरोहर को बचा पायेंगे?









1 टिप्पणी:
मनीषा जी बात तो आपने बड़ी सहजता से बता दी लेकिन क्या ये सोचा की कुआ ज्यादा जरूरी है या पानी . केवल परम्परा को बचाने के लिए आप कुआ को रखना चाहती हैं तो मुझे थोड़ा दुःख होगा. आज से २०० साल बाद मौसी शब्द नही रहेगा. ये मेरा मानना है क्योंकि तब तक लोग एक बच्चा ही चाहेंगे तो क्या हमे परम्परा के लिए २ या ३ बेटिया पैदा करनी चाहिए, नही न. हमे पानी की जरुरत है न की कुआ की "सेव वाटर"
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