Sunday, 22 July, 2007

तुगलकी फैसले

पुराने जमाने में दिल्ली पर मुहम्मद बिन तुगलक नाम के बादशाह का शासन था। वह अपने जमाने में लिये गये फैंसलों के लिये आजतक जाना जाता है। उसका सबसे प्रमुख और चर्चित फैसला भारत की राजधानी को भारत के मध्य में स्थित दौलताबाद ले जाना था। इस फैसले से जनता को बहुत ही कष्ट हुआ था।

इसी प्रकार के जनता को परेशान करने वाले फैसले अभी भी दिल्ली के शासकों द्वारा लिये जाते हैं जिससे जनता को बहुत परेशानी होती है। सबसे ताजा फैसला है आयकर विभाग द्नारा अभी तक बनाये जा रहे पैन कार्डों को (PAN cards) को बायोमैट्रिक कार्डों में बदला जाना।

पहले तो आयकर विभाग ने बिना विचारे पैन कार्ड योजना लागू कर दी, बिना इस बात की तैयारी किये कि बड़ी संख्या में पैन कार्ड आयकर विभाग तैयार कर भी पायेगा या नहीं। लोगों ने फार्म न. 49 जमा कर दिये और वर्षों तक बहुत सारे लोगों को पैन कार्ड मिले ही नहीं। हालांकि इसे देने की जिम्मेदारी आयकर विभाग की बनती थी। नाकाम रहने के बाद विभाग ने यूटीआई (UTI) से सहयोग किया और पैन कार्ड बनवाने का काम यूटीआई को सोंप दिया गया। इसकी फीस 65 रुपये रखी गई और इस प्रकार जनता को जो कार्ड मुफ्त मिलना चाहिये वो 70 रुपये का पड़ने लगा (5 रु फार्म के मिलाकर)। पैन कार्ड से जनता को क्या फायदा है ये तो आजतक नहीं पता चला, आयकर विभाग को इससे फायदा है, आयकर दाताओं का पूरा चिठ्ठा विभाग पर इकठ्ठा हो गया। कीमत जनता चुका रही है, फायदा सरकार का।

अब जब जनता इस बात को चुपचाप स्वीकार कर के पैन कार्ड बनबा रही है तब ये नयी बात आ गई कि अब पैन कार्ड बायोमैट्रिक बनाये जायेंगे। ये बायोमैट्रिक कार्ड सभी को बनवाने पड़ेंगे। यानी जिन लोगों ने पहले पैन कार्ड बनवा भी लिये हैं उन्हें भी दुबारा कार्ड बनवाने होंगे। दुबारा सारी जनता परेशान होगी। जनता को तो पैन कार्ड से कोई फायदा है नहीं परेशानी ही परेशानी है और फायदा आयकर विभाग का है।

इसी तरह दिल्ली सरकार ने पिछले दिनों वाहनों के पंजीकरण और ड्राइविंग लाइसेंस का कम्प्यूटरीकरण करके स्मार्ट कार्ड बनाये थे। इन स्मार्ट कार्डो की फीस अब काफी रखी रखी गई है जबकी फीस पहले बहुत कम थी। इस प्रकार कम्प्यूटरीकरण की कीमत जनता चुका रही है। जनता को इस स्मार्ट कार्ड से क्या फायदा मिला किसी को पता नहीं लेकिन परिवहन विभाग को एक तो पैसा उगाहने का मौका मिल गया वहीं कम्प्यूटरीकरण से से अपना डाटाबेस भी तैयार हो गया।

कहने का मतलब है कि जनता कीमत चुकाती है और फायदा विभागों का होता है।

3 टिप्पणी:

Isht Deo Sankrityaayan said...

दरअसल जब कुछ लोग खुद को देश-दुनिया का भाग्यविधाता मानकर बैठ जाते हैं और हम उनके तुगालाकी फैसलों के खिलाफ बोलना भी छोड़ देते हैं तो यही होता है.

विष्णु बैरागी said...

जनता की दुहाई दे कर विधयिका सदनों में बैठने वाले सबसे पहले जनता को ही भूलते हैं । ये इस भ्रम में जीते हैं कि ये सरकार चला रहे हैं जबकि होता यह है कि अधिकारी इन्‍हें अपनी इच्‍छानुसार नचाते हैं । इसीलिए लोहिया इन्‍हें 'नौकरों के नौकर' कहा करते थे ।

Udan Tashtari said...

यही विडंबना है, क्या करियेगा. बस लिख कर जागरुकता लाने का प्रयास करें शायद सही कानों तक कभी कलम की आवाज पहुंच जाये. आप अपना कर्तव्य करते रहें.

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