Monday, 18 June, 2007

औरतें और गपशप

कभी बैठ कर सोचती हूँ कि कितना समय अपने आप को परेशान करने में लगाते हैं। मैं एक औरत हूँ और इसी कारण औरतों के बारे में ज्यादा अच्छी तरह से समझ सकती हूँ। खास तौर पर मेरी जैसी गृहणियों के बारे में मैं ज्यादा कह सकती हूँ। घरेलू औरतों की जिन्दगी बंधी-बंधाई होती है, सुबह जल्दी-2 काम निबटाना ता कि खाली समय मिलते ही या तो पास-पड़ोस में बैठना और गप्पें मारना या फिर टीवी पर सास-बहु के सीरियल देखना। क्यों होता है ऐसा? हालांकि पहले मैं भी ऐसी ही महिलाओं में से एक महिला थी, लेकिन अब ब्लागिंग में काफी समय लग जाता है। हम जैसी घरेलू महिलायें कितना कीमती समय यूं ही बर्बाद कर देती हैं, क्यों नहीं हम अपनी सोच का दायरा बढ़ाती हैं? खाली समय में अगर हम गप्पें मारते हैं तो क्यों नहीं अच्छे ज्ञानवर्धक विषयों पर बहस करते हैं? क्यों नहीं हम सास-बहु सीरियल की जगह टीवी पर नयूज चैनल और डिस्कवरी चैनल देखते हैं? ताकि हमारी संकीर्ण सोच भी बदले और बच्चों को भी एक अच्छी सोच वाला व्यक्ति बना पायें, क्योंकि बच्चों पर सबसे अधिक प्रभाव मां का रहता है, और यदि हम ऐसा कर पाते हैं तो हम आगे चलकर एक स्वच्छ, स्वस्थ, विकासशील समाज का निर्माण कर पायेंगे।

यदि हमारी वही संकीर्ण मानसिकता रहेगी, वही कहानी घर घर की, तेरा-मेरा, बुराई-भलाई में ही पड़े रहेंगे तो निश्चित ही आगे चल कर अपने परिवारों की शान्ति खो देंगे। सास-बहु सीरियलों से शिक्षा लेकर अपनों को ही तंग करते रहेंगे, बहु में, सास में, दामाद में, ननदों में कमियां निकलते रहेंगे और परिवारों की शान्ति भंग करते रहेंगे।

क्यों नहीं हम औरतें इस तरह के विषयों पर बहस करतीं कि आगे चलकर जब हमारा समय आयेगा तो हम दहेज प्रथा का विरोध करेंगी, घर की बहू-बेटियों पर अत्याचार नहीं होने देंगे, अपने अपने घरों मे शिक्षा का स्तर बढ़ायेंगे। यदि आज की आम घरेलू औरतें ऐसे विषयों पर पर चिंतन कर अमल करने लगें तो वाकई आने वालें समय में हम समाज में कुछ बुराईयां व कुरीतियां कम हो जायेंगी।

1 टिप्पणी:

हरिराम said...

महिलाओं की गप्प-शप्प बेकार नहीं जाती, पड़ोंसियों से सम्पर्क महिलाओं के ही अधिक होते हैं, आस-पड़ोस की खबरें, जानकारियों इस तरह उनके पास ही ज्यादा होती हैं, जबकि पुरुष अनजान रहते हैं, सामाजिक मिलनसारिता उन्हीं से पनपती है। हर बात का अपना महत्व है... कोई बेकार नहीं है...

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